10. हिंदू और उनके सामाजिक विवेक का अभाव - Page 145

130 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

हैं। इस जाति का कोई भी कुत्ता उसके आस-पास बीस गज दूर से भी नहीं

निकल सकता और कोई दिख भी जाता है, तो वह भूंक-भूंककर आसमान

सिर पर उठा लेता है। उसकी यह बात जॉन स्मिथ को बेहद बुरी लगती है

और वह उसे चुप करने का हर संभव प्रयत्न भी करते हैं क्योंकि पैडी जिन

कुत्तों से नफरत करता है, वे बेचारे चुपचाप रहते हैं और कभी भी पहले

नहीं भूंकते। मेरा दोस्त, हालांकि पैडी को बहुत प्यार करता है, तो भी वह

यह सोचता है, और जैसा कि मैं भी सोचता हूं कि पैडी की यह आदत बहुत

कुछ उसके किसी जाति-विशेष होने पर उसके स्वभाव के कारण है। हमसे

किसी ने यह नहीं कहा कि यहां जो समस्या है, वह स्कॉच शिकारी कुत्ते

की समस्या है और जब पैडी अपने पास के किसी कुत्ते पर झपटता है जो

बेचारा टट्टी-पैशाब वगैरह के लिए जमीन सूंघ-सांघ रहा होता है, तब उस

कुत्ते को क्या इसलिए मारना-पीटना चाहिए कि वह वहां अपने अस्तित्व के

कारण पैडी को हमला करने के लिए उसका देता है।’’

यहां यदि हम पैडी की स्थिति में हिंदू को और स्कॉच शिकारी कुत्ते की स्थिति में अस्पृश्यों को रखकर विचार करें तो हम देखेंगे कि लुइस गोल्डिंग का तर्क हिंदुओं के संबंध में भी उतना ही लागू होगा, जिनता ईसाइयों पर होता है। अगर गोल्डिंग की बात मानी जाए तो यहूदियों की समस्या वास्तव में ईसाइयों की समस्या है, तब अस्पृश्यों की समस्या भी मूलतः हिंदुओं की समस्या है।

क्या हिंदुओं को इसका अहसास है? क्या वे मानते हैं कि अस्पृश्य उनके लिए समस्या हैं? क्या उन्हें इसकी चिंता है? क्या वे इस पर विचार करते हैं? सचाई जानने के लिए कई बातें देखनी होंगी। एक कसौटी तो यही है कि इस विषय पर कितना साहित्य रचा गया है। मानक कसौटी के रूप में हम अमरीका में नीग्रो लोगों के बारे में रचे गए साहित्य को लें। हमें जानकर आश्चर्य होता है कि अमरीका में नीग्रो लोगों के संबंध में ढेर सारी सामग्री छपी है। कहा जाता है कि नीग्रो समस्या के संबंध में गं्रथों की सूची तैयारी की जाए, तो कई लाखों पुस्तकों की सूची बन जाएगी। वास्तव में इस विषय पर असंख्य पुस्तकें लिखी गई हैं। यही इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि श्वेत लोगों के लिए यह कितनी बड़ी समस्या है। इस समस्या ने अमरीका में वहां के सभी वर्ग के लोगों को कई पीढि़यों तक प्रेरित रखा जिनमें धार्मिक, आदर्शवादी, राजनैतिक चिंतक, राजनेता, दानी, समाज विज्ञानी, राजनीतिज्ञों, व्यापारियों के साथ-साथ साधारण नागरिक भी आते हैं।