136 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यह अंतर क्यों है? अमरीका में लोग अपने यहां नीग्रो लोगों के उत्थान के लिए सेवा और त्याग कर इतना सब कुछ क्यों करते हैं और अस्पृश्यों के उत्थान के लिए हिंदू लोग कुछ भी क्यों नहीं करते हैं? इसका एक ही उत्तर है कि अमरीकियों में सामाजिक विवेक है, जब कि हिंदुओं में इसका सर्वथा अभाव है। ऐसी बात नहीं कि हिंदुओं में उचित-अनुचित, भला-बुरा या नैतिकता-अनैतिकता का कोई विचार नहीं हैं हिंदुओं में दोष यह है कि अन्य के संबंध में उनका जो नैतिक विवके है, वह सीमित वर्ग, अर्थात् अपनी जाति के लोगों तक ही सीमित है। जैसा कि श्री एच. जे. पैटन कहते है ख्1, ः
कोई व्यक्ति नैतिक दृषि् से अच्छा हुए बिना भी किसी विशिष् समाज में
एक अच्छा व्यक्ति हो सकता है। जो व्यक्ति अपने जीवन में कानून-सम्मत
अपनी एक पृथक जीवन-चर्या बना लेता है और तदनुसार आचरण करता
है, उसमें भी नैतिक गुणों की छाया या उसका आभास मिल सकता है, और
उसके जीवन में कोई ऐसा गुण हो सकता है, जिसे हम नैतिक गुण समझने
की गलती कर जाएं। ऐसा व्यक्ति किसी भी समाज का हो सकता है, चाहे
वह चोरों या डाकुओं का कोई गिरोह ही क्यों न हो। हालांकि चोरों या डाकुओं
में भी कोई व्यक्ति ऐसा होता है, जिसे वे आदर देते हैं। लेकिन वह चोर या
डाकू इस कारण आदरणीय व्यक्ति तो नहीं हो सकता। नैतिक दृषि् से कोई
व्यक्ति अच्छा तभी कहा जाएगा, जब वह किसी सीमित समाज में ही अच्छा
व्यक्ति नहीं कहा जाए, बल्कि उसे उस समाज के बाहर भी लोग अच्छा कहें।
समाज कई समाजों का हो सकता है, जिसके उद्देश्य में सभी समाजों उद्देश्य
अंतर्निहित होते हैं। ऐसे समाज से परे कोई समाज नहीं होता है, जिससे कर्तव्यों
में कोई अंतर्विरोध उत्पन्न होने की कोई गुंजाइश रहे।
अस्पृश्य लोग हिंदुओं के समाज के नहीं हैं और हिंदू भी यह नहीं समझते हैं कि वे और अस्पृश्य, दोनों एक ही समाज के लोग हैं। यही कारण है कि हिंदुओं में नैतिक दृषि् से अस्पृश्यों के प्रति कोई चिंता या ममत्व नहीं होता।
चूंकि हिंदुओं में इस प्रकार के विवेक का अभाव होता है, इसलिए उनके हृदय में हठधर्मिता और अन्याय के विरुद्ध, जिनसे अस्पृश्य लोग पीडि़त हैं, न्यायोचित रोष उत्पन्न नहीं होता। वे इस हठधर्मिता और अन्याय को गलत नहीं समझते और कुछ भी मानने के लिए तैयार नहीं हैं। हिंदुओं में विवेक का अभाव अस्पृश्यता के निवारण के रास्ते में एक बड़ी बाधा है।
- ‘दि गुड विल’ एच. जे. पैटर्न पृ. 281