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हिंदू और जातिप्रथा में
उसका अटूट विश्वास
हिंदू समाज-सुधारकों में कुछ उदारवादी भी हैं। इस वर्ग का कहना है कि अस्पृश्यता हिंदुओं की जातिप्रथा से भिन्न है। इस सिद्धांत के आधार पर वे कहते हैं कि जातिप्रथा नष् किए बिना भी अस्पृश्यता दूर हो सकती है। धर्मनिष्ठ हिंदू अस्पृश्यता दूर करने का उतना ही विरोधी है, जितना कि वह जातिप्रथा को दूर करने के विरुद्ध है। वह दो चरणों में समाज-सुधार का उतना ही विरोधी है, जितना कि वह एक चरण में समाज के सुधार का विरोधी है। परंतु राजनीति के खिलाड़ी हिंदुओं को यह विचार बहुत पसंद है। साफ तौर पर इसके दो कारण हैं। पहली बात तो यह है कि इस प्रकार उसे संसार को यह दिखाने का अवसर मिलता है कि वह लोकतंत्र का सबसे बड़ा समर्थक है। दूसरी बात यह है कि अगर वह जातिप्रथा का विरोध नहीं करता है, तब सवर्ण हिंदुओं द्वारा कांग्रेस को छोड़ने का कोई भय नहीं रह जाता।
जो लोग जातिप्रथा को दूर किए बिना अस्पृश्यता-निवारण की बात करते हैं, वे अपने तर्क की पुषि् में ‘मनुस्मृति’ के दसवें अध्याय के चौथे श्लोक को उद्धत करते हैं। इस श्लोक में मनु केवल चार वर्ण बताता है। कोई पंचम वर्ण है ही नहीं। इस श्लोक का अर्थ इस प्रकार किया जाता है कि अस्पृश्य लोग शूद्रो की ही श्रेणी में हैं और जब शूद्रों को न छूने का कोई विधान नहीं है, तब अस्पृश्यों को छूने में भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यह व्याख्या राजनैतिक हिंदुओं को चाहे जितनी अच्छी लगे, लेकिन मनु के अभिप्राय से यह भी व्याख्या मेल नहीं खाती। इस श्लोक की व्याख्या अन्य प्रकार की भी हो सकती है और इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि मनु चातुर्वर्ण्य का विस्तार नहीं चाहता था और इन समुदायों को मिलाकर पंचम वर्ण की व्यवस्था के पक्ष में नहीं था, जो चारों वर्णों से बाहर थे। यह कहकर कि पंचम वर्ण नहीं है, वह यह बताना चाहता है कि जो