11. हिंदू और जातिप्रथा में उसका अटूट विश्वास - Page 153

138 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

चातुर्वर्ण्य से बाहर हैं, उन्हें वह पांचवा वर्ण बनाकर हिंदू समाज में शामिल नहीं करना चाहता था। इस बात को उसने स्पष् रूप से कहा है, जब वह वर्ण-बाह्य ख्1,, लोगों का जिक्र करता है, जिसका अर्थ है वे लोग, जो वर्ण-व्यवस्था से बाहर हैं। यदि मनु सभी लोगों को चार वर्णों में रखना चाहता, तो वर्ण-बाह्य कहने की जरूरत ही क्या थी? वर्ण-बाह्य में भी वह दो श्रेणियां रखना चाहता था। उसने इन्हें हीन ख्2, और अन्त्येवासी ख्3, कहा है। इन तथ्यों से यह स्पष् होता है कि उक्त श्लोक का जैसा भाष्य प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया जाता है, उससे कट्टरपंथी हिंदुओं को भ्रम में नहीं डाला जा सकता कि अस्पृश्यता ‘मनुस्मृति’ से मेल नहीं

खाती और इसका उन्मूलन हिंदू विधान के प्रतिकूल नहीं है।

मनु के श्लोक की उक्त व्याख्या पर आश्रित तर्क सामान्य और अशिक्षित हिंदू की समझ से परे है। वह तो केवल दो बातें जानता है। एक तो यह कि सामाजिक व्यवहार में तीन प्रकार के बंधन हैं, जिनका पालन किया जाना चाहिए। वे हैं- (1) जातियों के बीच आपस में खान-पान निषिद्ध, (2) जाति के बाहर बेटी व्यवहार वर्जित, और (3) कुछ जातियों के लोगों के छू जाने पर भी परहेज। पहले दो प्रतिबंधों से जाति बनती है और तीसरे प्रतिबंध से अस्पृश्यता का जन्म होता है। सवर्ण हिंदू को प्रतिबंधों की संख्या से कोई गुरेज नहीं। वह प्रतिबंध के आचरण पर विशेष ध्यान रखता है। जब उससे इन प्रतिबंधों का अनुपालन नहीं करने के लिए कहा जाता है, तब वह पलट कर पूछ बैठता है, क्यों? वह कहता है, ‘जब मैं पहले दो प्रतिबंधों को मानता हूं तो तीसरे का अनुपालन करने में क्या हर्ज है।’ मनौवैज्ञानिक रूप में जातिप्रथा और अस्पृश्यता आपस में गुंथी हुई हैं और एक ही सिद्धांत पर आधारित हैं। यदि कोई सवर्ण हिंदू छूतछात बरतता है, तो इसका अर्थ है कि वह जाति में यकीन रखता है।

यदि इस दृषि् से विचार किया जाए, तब यह स्पष् हो जाएगा कि जातिप्रथा को समाप्त किए बिना अस्पृश्यता के विनाश की आशा करना बालू की भीत बनाना है। यह विचार कि जातिप्रथा और अस्पृश्यता, दोनों अलग-अलग हैं, एक दिवा-स्वप्न है। दोनों एक ही हैं और इन्हें अलग नहीं किया जा सकता। अस्पृश्यता, जातिप्रथा का ही परिणाम है। दोनों को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। दोनों का चोली-दामन का साथ है।

  1. मनुस्मृति, 10.28

  2. वही, 10.31.

  3. वही, 10.39.