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प्रशासन का दृष्टिकोण

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के अनुरूप न्याय उनका आदर्श है। यह स्वाभाविक है, क्योंकि स्थापित व्यवस्था में समाज के विभिन्न वर्गों के प्रति दृष्किण को वे प्रशासन का आधार मानते हैं। प्रशासन के क्षेत्र में अस्पृश्यों के प्रति सरकार के अधिकारियों का जो दृष्किण है, उससे यह बात पूरी तरह स्पष् हो जाती है।

प्रत्येक अस्पृश्य इस बात का गवाह है कि जब कोई अस्पृश्य किसी सवर्ण हिंदू के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराने पुलिस अधिकारी के पास जाता है तो उसे संरक्षण के स्थान पर ढेर सारी गालियां सुनने को मिलती हैं। या तो उसे बिना रिपोर्ट लिखे भगा दिया जाता है या रिपोर्ट ऐसी झूठी लिखी जाती है कि उसमें स्पृश्य को बच निकलने का कोई न कोई रास्ता अवश्य छोड़ दिया जाता है। यदि वह किसी मजिस्ट्रेट की अदालत में मुकदमा ले जाता है तो उस पर क्या कार्रवाई होगी, यह पहले ही मालूम हो जाती है। किसी अस्पृश्य को कोई हिंदू गवाही देने के लिए नहीं मिलेगा, क्योंकि गांव में पहले ही षड्यंत्र रच दिया जाता है कि कोई भी अस्पृश्य की हिमायत में नहीं उठेगा, चाहे सच कुछ भी क्यों न हो। यदि वह किसी अस्पृश्य को गवाही देने के लिए ले आएगा तो मजिस्ट्रेट गवाही को स्वीकार ही नहीं करेगा, क्योंकि वह आसानी से कह देगा कि यह तो उसी का हितैषी है, इसलिए उसे स्वतंत्र गवाह नहीं कहा जा सकता। यदि स्वतंत्र गवाह है भी तो मजिस्ट्रेट के सामने एक आसान-सा तरीका यह कह देना है कि उसे अस्पृश्य के पक्ष में गवाह सच्चा नहीं प्रतीत होता। वह निडर होकर ऐसा फैसला सुना देगा, क्योंकि उसको पता है कि उसके ऊपर कोई अदालत उसके इस फैसले को नहीं बदलेगी, क्योंकि यह एक स्थापित नियम है कि अपील सुनने वाली अदालत मजिस्ट्रेट के फैसले में दखल न दे, जो गवाहियों पर आधारित है और जिनकी उसने जांच नहीं की है।

ऐसे भेदभाव होते हैं, इस बात को अब कांग्रेस ने भी स्वीकार कर लिया है। 7 मार्च, 1938 के ‘हिंदू’ के अंक में प्रकाशित तमिलनाडु हरिजन सेवक संघ की 30 सितम्बर, 1937 की सालाना रिपोर्ट में कहा गया हैः

‘‘इन अधिकारों के कारण दूर-दराज के गांवों में भी हरिजनों में राजनैतिक

जागृति आ गई है, जहां केवल पुलिस का राज चलता है और जहां इन अधि

कारों की मांग करना हरिजनों के लिए हमेशा संभव नहीं होता, क्योंकि अधि

कारों की मांग करने का अर्थ सवर्णों और उनके बीच मारपीट होता है,

इस मारपीट में सवर्णों का हाथ ऊपर रहता है। इस मारपीट का स्वाभाविक

परिणाम या तो पुलिस में या मजिस्ट्रेट को शिकायत दर्ज कराना होता है।