146 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मजिस्ट्रेट को शिकायत करना हरिजन के लिए आर्थिक दृषि् से संभव नहीं
होता और पुलिस में शिकायत करने का नतीजा और भी खराब होता है। अनेक
मामलों में इन शिकायतों की कभी कोई जांच नहीं होती, कई अन्य मामलों
में सदा सवर्णों के पक्ष में ही निर्णय दर्ज किया जाता है। पुलिस में हमने जो
शिकायतें कीं उनका भी यही परिणाम हुआ। हमें ऐसा लगता है कि पुलिस
के निचले कर्मचारियों के दृष्किण में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। या तो वे
हरिजनों के अधिकारों से नावाकिफ हैं, जिनकी रक्षा करने की उनसे अपेक्षा
होती है या वे सवर्णों के प्रभाव में आ जाते हैं। यह भी हो सकता है कि
वे बिल्कुल ही उदासीन रहते हैं। अन्य मामलों में अमीर सवर्ण की तरफदारी
भ्रषचारवश की जाती है।’’
इससे स्पष् है कि हिंदू अधिकारी अस्पृश्यों के कितने विरोधी और हिंदुओं के कितने तफरदार होते हैं। अगर उनके सामने अपने अधिकार या अपने विवके के इस्तेमाल का सवाल उठता है, तब उनका निर्णय अस्पृश्यों के खिलाफ ही होता है।
पुलिस कर्मचारी और मजिस्ट्रेट अक्सर भ्रष् होते हैं। अगर वे सिर्फ भ्रष् हों तो स्थिति इतनी खराब न हो, क्योंकि जो अधिकारी भ्रष् होता है, वह किसी भी पक्ष के द्वारा खरीदा जा सकता है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि पुलिस कर्मचारी और मजिस्ट्रेट भ्रष् होने की अपेक्षा अधिक पक्षतापूर्ण होते हैं। हिंदुओं के प्रति उनके इस पक्षपातपूर्ण और अस्पृश्यों के प्रति विरोधपूर्ण रवैये के कारण अस्पृश्यों को सुरक्षा और न्याय नहीं मिल पाता। एक के प्रति पक्षपात और दूसरे के प्रति विरोध का कोई निदान नहीं है, क्योंकि यह सामाजिक और धार्मिक नफरत की भावना पर आधारित है, जो प्रत्येक हिंदू में जन्मजात होती है। पुलिस और मजिस्ट्रेटों को अपनी प्रेरणाओं, हितों और संस्कारों के कारण अस्पृश्यों की भावनाओं के साथ सहानुभूति नहीं होती। वे उस अभाव पीड़ा, लालसा और इच्छाओं से अनुप्राणित नहीं होते, जो अस्पृश्यों को अद्वेलित किए रहती हैं। फलस्वरूप वे लोग अस्पृश्यों की आकांक्षाओं के प्रति खुलकर विरोधी और विद्वेषपूर्ण हो जाते हैं, प्रगति करने में उनकी सहायता नहीं करते, उनके हित की उपेक्षा करते हैं और ऐसी हर चीज को काट देते हैं, जिसमें अस्पृश्यों को गर्व और आत्म-सम्मान मिल सके। दूसरी ओर वे हिंदुओं का उनके हर काम में साथ देते हैं, उनके साथ पूरी सहानुभूति रखते हैं, जिससे उनकी शक्ति, क्षमता, मान-मर्यादा और प्रतिष बनी रहे। जब कभी इन दोनों में संघर्ष होता है, तब वे अस्पृश्यों के इस विद्रोह को कुचलने में हिंदुओं के एजेंट का काम करते हैं और प्रकट रूप से और निर्लज