12. प्रशासन का दृष्टिकोण - Page 162

प्रशासन का दृष्टिकोण

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होकर हिंदुओं के हर घिनौने काम में हर संभव, उचित-अनुचित सहायता भी देते हैं, जिससे अस्पृश्यों को उनकी करनी का फल चखाया जा सके और वे ऊपर उठने न पाएं।

इसका सबसे अधिक बुरा पक्ष यह है कि यह सब अन्याय और उत्पीड़न कानून की सीमाओं के अंदर किया जा सकता है। कोई हिंदू यह साफ तौर पर कह सकता है कि वह किसी भी अस्पृश्य को नौकरी पर नहीं लगाएगा, वह उसे कुछ भी नहीं बेचेगा, वह उसे अपने खेतों से बेदखल कर देगा, किसी कानून को तोड़े बिना भी वह उसके जानवर अपने खेतों से होकर नहीं जाने देगा। वह ऐसा कर अपने अधिकार का ही उपयोग कर रहा है। कानून को इस बात की परवाह नहीं कि इस सबके पीछे उसका इरादा क्या है। कानून यह नहीं देखता कि इससे उस अस्पृश्य को कितनी हानि हो रही है। पुलिस अपनी शक्ति और अपने अधिकार का दुरुपयोग कर सकती है। पुलिस अधिकारी इस बात को दर्ज कर, जो कही ही नहीं गई या ऐसी बात को दर्ज कर, जो कही गई बात से बिल्कुल भिन्न है, जान-बूझकर अपने रिकार्ड तोड़-मरोड़ सकता है। वह उस पक्ष को गवाहों के नाम-पते आदि बता सकता है, जिसमें उसका स्वार्थ होता है। वह किसी को गिरफतार करने से मना कर सकता है। वह किसी मामले को

खत्म कर देने के लिए हजार काम कर सकता है। वह यह सब काम पकड़े जाने के डर के बिना कर सकता है। कानून में बहुत-सी कमियां हैं और वह इन कमियों को अच्छी तरह जानता है। मजिस्ट्रेट ने उसे अपने विवेक का इस्तेमाल करने के लिए पूरी तरह छूट दे रखी है। वह उसका इस्तेमाल करने के लिए पूरी तरह आजाद है। किसी भी मामले का निर्णय गवाहों पर निर्भर करता है, जो गवाही दे सकते हैं। लेकिन मुकदमे का निर्णय इस बात पर निर्भर करता है कि क्या गवाहियां विश्वसनीय हैं या नहीं। यह मजिस्ट्रेट पर निर्भर करता है कि वह किस पर विश्वास और किस पर अविश्वास करता है। वह किसी भी पक्ष पर विश्वास करने के लिए पूर्ण स्वतंत्र है और वह जो कुछ करता है, वह उसका अपना विवके होता है, कोई उसके इस विवेक का इस्तेमाल करने में दखल नहीं कर सकता है। ऐसे बहुत से मामले हैं, जिनमें मजिस्ट्रेट ने अपने विवेक का इस्तेमाल अस्पृश्यों के हितों के खिलाफ किया है। अस्पृश्यों की गवाहियां चाहे कितनी भी सच्ची क्यों न हों, मजिस्ट्रेट सभी मामलों में एक ही बात कह देता है कि ‘मुझे गवाहों पर विश्वास नहीं है’ और किसी ने भी उसके इस विवेक के बारे में सवाल नहीं किया है। क्या दंड देना है, यह भी मजिस्ट्रेट के विवेक पर निर्भर करता है। कुछ ऐसे भी निर्णय होते हैं, जिनके खिलाफ अपील नहीं