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भेदभाव की समस्या

अस्पृश्यों को जिन गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है, उनमें क्रम से इंसानों का दर्जा पाने की समस्या के बाद दूसरी समस्या भेदभावपूर्ण व्यवहार की आती है। अस्पृश्यों के साथ हिंदुओं द्वारा कितना भेदभाव किया जाता है, इसके परिण् ाम की कल्पना करना किसी विदेशी व्यक्ति के लिए असंभव है। जीवन में कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जहां अस्पृश्य और हिंदुओं की एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा न होती हो और जिसमें अस्पृश्यों के साथ भेदभाव न किया जाता हो। यह भेदभाव बहुत ही मर्मांतक तरीके का होता है।

सामाजिक संबंध, जैसे आमोद-प्रमोद, खान-पान, खेलकूद और पूजा-पाठ के मामले में यह प्रतिबंध का रूप ले लेता है। इस कारण साधारण से साधारण क्षेत्र में भी भाग लेने पर रोक लग जाती है।

सार्वजनिक सुविधाओं के क्षेत्र में यह भेदभाव अस्पृश्यों को स्कूलों, कुओं, मंदिरों और यातायात से वंचित कर देता है। सार्वजनिक प्रशासन अस्पृश्यों के प्रति भेदभाव से सबसे अधिक प्रभावित है। इसने कचहरियों, सरकारी विभागों, सहकारी बैंकों, विशेषकर पुलिस को प्रभावित किया है। भूमि, ऋण और नौकरियां प्राप्त करने के मामले में तो यह खुल्लम-खुल्ला देखने को मिलता है। यह सबसे ज्यादा नौकरियों के क्षेत्र में है। हालांकि कोई विनियम नहीं है, लेकिन कुछ ऐसे सर्वमान्य नियम जरूर हैं, जो नौकरियों में अस्पृश्यों के प्रवेश और उनकी प्रोन्नति को नियंत्रित करते हैं। अस्पृश्यों को अक्सर प्रवेश नहीं मिलता। इनके लिए सारे विभाग बंद हैं। कपड़ा मिलों में बुनाई विभाग, सेना के सभी अंग अस्पृश्यों के लिए बंद है। अगर उसे प्रवेश मिल भी जाए, तब वहां पूर्व निर्धारित एक स्तर होता है जिसके बाद अस्पृश्य आगे उठ नहीं सकता, चाहे वह कितना ही कुशल या पुराना क्यों न हो। जिस सिद्धांत का आमतौर पर पालन किया जा रहा है, वह यह है कि अस्पृश्य को हिंदुओं के ऊपर कोई प्रशासनिक अधिकार वाला पद नहीं