भेदभाव की समस्या
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जाति वाला गायक कहा जाता है। किसी हिंदू कुश्तीबाज का वर्णन करते समय उसे भारत का एक महान कुश्तीबाज कहा जाता है। अगर वह अस्पृश्य जाति का हो, तब उसे अस्पृश्य जाति का कुश्तीबाज बताया जाता है।
इस प्रकार के भेदभाव का मूल हिंदुओं की इस विचारधारा में है कि अस्पृश्य लोग हीन होते हैं और वे चाहे जितने योग्य हों, उनके महान व्यक्ति केवल अस्पृश्यों के लिए महान हैं। वे उन व्यक्तियों से महान नहीं हो सकते और न उनके बराबर हो सकते हैं, जो हिंदुओं में महान हैं। इस प्रकार भेदभाव यद्यपि सामाजिक होता है, परंतु यह आर्थिक भेदभाव से कम कष्दायक नहीं होता है।
स्वतंत्रता के अभाव का ही दूसरा नाम भेदभाव है। जैसा कि श्री टोनी का कथन है ख्1, ः
स्वतंत्रता जैसी कोई चीज दुनिया में नहीं है, जो विशिष् काल और स्थान
से अप्रभावित रहती हो। इसका चाहे जो आशय हो या न भी हो, इसमें कई
विकल्पों में से चयन करने की शक्ति निहित रहती है, विकल्पों में से चयन
यथार्थ होता है, केवल सांकेतिक नहीं होता, इसकी सत्ता वास्तविक होती है,
सिर्फ कागजों पर ही नहीं रहती। संक्षेप में, इसका आशय कुछ करने की योग्यता
से या किन्हीं निश्चित परिस्थितियों में, निश्चित क्षण में, निश्चित कार्य करने
से विरत रहने से या इसका आशय कुछ भी नहीं होता है, क्योंकि कोई व्यक्ति
जब कुछ सोचता है, इच्छा करता है और कुछ करता हे, तब वह प्रायः कोई
व्यक्ति होता है, इस स्वतंत्रता में वह सब-कुछ होता है, जिसके बारे में कवियों
ने कह रखा है, लेकिन प्रतिदिन के जीवन के गद्य में यह बिल्कुल व्यवहारिक
और वास्तविक होता है। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी अपेक्षाएं होती हैं- इनमें
भौतिक जीवन के लिए जरूरी चीजों के साथ वाणी और लिपि के द्वारा स्वयं
को अभिव्यक्त करने की भी अपेक्षा शामिल हैं, समान हित के कार्यों में भाग
लेने और अपने-अपने ढंग से ईश्वर की आराधना करने या उसकी आराधना
से विरत रहने की अपेक्षा भी शामिल है, अर्थात् जो कुछ उसके कल्याण के
लिए आवश्यक है, उसे प्राप्त करने का संतोष। इन सारी अपेक्षाओं में से अगर
मूल अपेक्षा को ही ग्रहण किया जाए, तब उसकी स्वतंत्रता प्रकृति द्वारा नियम
सीमाओं में उसके द्वारा प्राप्त किए गए अवसर और उसके संगी-साथियों द्वारा
समान अवसरों का उपभोग करने और यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक
कार्रवाई करने में निहित है कि ये अपेक्षाएं पूरी हों।
- ‘वी मीन फ्रीडम इन वाट लेबर कैन डू’ पृ. 83-85