13. भेदभाव की समस्या - Page 167

152 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मेरा इरादा इन स्वतंत्रताओं के लिए आवश्यक अधिकारों की एक और सूची जोड़ने का नहीं है, क्योंकि इनकी सूची तो पहले से ही विद्यमान है। लेकिन दो बातें ऐसी हैं, जो इन सभी पर लागू होती हैं। पहली बात तो यह कि यदि स्वतंत्रता के लिए अधिकारों को प्रभावी होना है, तब वे इस प्रकार न बनाए जाए, जैसे जिन लोगों में आर्थिक सामर्थ्य है, वे सभी रिट्ज होटल में खा-पी सकते हैं। वे ऐसे होने चाहिए कि जब कभी उन्हें प्रयोग करने का अवसर आए तब उनका वास्तविक रूप में प्रयोग किया जा सके। मत देने और एकजुट होने के अधिकार हालांकि पूरी तरह मूल्यहीन नहीं होते, तो भी वे स्पष् रूप से तब निष्प्रभावी हो जाते हैं, जब पहले का परिणाम निष्कासन और दूसरे का परिणाम सर्वनाश होता है। अगर किसी व्यवसाय में प्रवेश का खर्च अपनी शक्ति से ज्यादा हो तो ये किसी व्यवसाय को चुनने का बेरोक अधिकार, अगर कोई गरीब आदमी न्याय की कीमत न चुका सके तब न्याय पाने का अधिकार, अगर वातावरण ऐसा हो कि जिसमें यह सुनिश्चित कर दिया गया हो कि जितने बच्चे पैदा हुए हैं, उनमें से अधिकांश जन्म के बाद बारह महीने में मर जाएंगे, तब कोई आशा करना मानो अपनी सारी पूंजी को जुए में दांव पर लगा बैठना है। दूसरी बता यह है कि जो अधिकार स्वतंत्रता के लिए आवश्यक हैं, वे ऐसे होने चाहिए जो न केवल अल्पसंख्यकों को, बल्कि सभी के लिए प्रत्येक स्वतंत्रता सुनिश्चित कर सकें। किसी मनीषी ने कहा है कि अगर पांच प्रतिशत जनसंख्या पत्नीत्व अपनाए हुए हैं और अधिकांश का जीवन संमस्याओं से ग्रस्त है, पति-पत्नी अपने दायित्व को नहीं समझते हैं, तब विवाह को राष्ट्रीय संस्था नहीं कहा जा सकता। यही बात स्वतंत्रता के लिए सच है। जिस समाज में कुछ वर्गों के लोग जो कुछ चाहें वह सब-कुछ कर सकें और बाकी वह सब भी न कर सकें जो उन्हें करना चाहिए, उस समाज के अपने गुण होते होंगे, लेकिन इनमें स्वतंत्रता शामिल नहीं होगी। यह समाज वहीं तक स्वतंत्र है, सिर्फ वहीं तक स्वतंत्र है, जहां तक इसे संगठित करने वाले सभी तत्व वास्तव में, केवल सिद्धांत में ही नहीं, अपनी शक्ति का अधिकाधिक प्रयोग कर सकते हैं, अपना पूर्ण विकास कर सकते हैं, वह सब-कुछ कर सकते हैं, जिसे वे अपना कर्तव्य समझते हैं, और -चूंकि स्वतंत्रता को कठोर नहीं होना चाहिए-जब वे अपने डैनों को फैलाना चाहें तब वे उन्हें फैला सकें। अगर इंसानों के अनुरूप जीने की सुविधा कुछ लोगों तक ही सीमित है, तब जिस सुविधा को आमतौर पर स्वतंत्रता कहा जाता है, उसे विशेषाधिकार कहना अधिक उचित होगा।