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अलग-थलग स्थिति की समस्या

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इस रेखाचित्र से पता चलता है कि हालांकि हिंदुओं की अनगिनत जातियां हैं। पर उन्हें चार वर्गों में समेटा जा सकता है। इन चार वर्गों में से प्रथम वर्ग शासक वर्ग है और द्वितीय, तृतीय तथा चतुर्थ वर्ग शासित लोगों के वर्ग हैं।

अब हम इस बात पर विचार करें कि इन वर्गों में से कौन से अस्पृश्यों के सहज मित्र हो सकते हैं।

हिंदू समाज के विशेषाधिकार वाले लोग प्रथम वर्ग में आते हैं। उन्होंने ही हिंदू समाज-व्यवस्था की रचना की। केवल उन्हीं को इस व्यवस्था से लाभ होता है और इस वर्ग के लोगों का लक्ष्य इस व्यवस्था की रक्षा करना है। दो मित्र और दो संगी-साथी सामुदायिक हित या वैचारिक सामीप्य के कारण एक-दूसरे से असहमत नहीं हो सकते।

जयराम-पेशा और आदिम जातियों की क्या स्थिति हैं? उनके पास हिंदू समाज-व्यवस्था को उलट देने का सबसे अधिक सशक्त कारण है।

शूद्रों की क्या स्थिति है?

द्वितीय वर्ग यानी शूद्रों के लिए हिंदू समाज-व्यवस्था के नियम उतने ही घृणास्पद हैं, जितने कि चतुर्थ वर्ग यानी अस्पृश्यों के लिए। हिंदू समाज में, जिसकी व्यवस्था उसके नियम-निर्माता मनु ने की है, शूद्रों की स्थिति बड़ी विचित्र है। विषय को सरलता से समझा जा सके, इसके लिए अलग-अलग शीर्षकों के अधीन शूद्रों की स्थिति संबंधी नियम नीचे दिए जा रहे हैंः

ब्राह्मण, क्षत्रियों और वैश्यों के गृह-स्वामियों से मनु कहता हैः

4.61. - ‘‘वह ऐसे देश में निवास न करें, जहां शूद्र शासक होते हों’’।

शूद्र को सम्मानीय व्यक्ति नहीं समझा जाना चाहिए, क्योंकि मनु ने यह व्यवस्था दी हैः

11.24.-‘‘कोई भी ब्राह्मण यज्ञ करने यानी धार्मिक प्रयोजनों के लिए कभी

भी शूद्र से धन नहीं मांगेगा’’।

शूद्र के साथ सभी विवाह-संबंध पूर्णतया वर्जित थे। अन्य तीन वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) में से किसी भी वर्ग की स्त्री के साथ विवाह वर्जित था। कोई भी शूद्र उच्च जातियों की किसी स्त्री के साथ किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं रख सकता था, और यदि कोई शूद्र उसके साथ जार कर्म करता है, तो मनु के विचार में वह ऐसा अपराध करता है, जिसके लिए मृत्यु-दंड है।