14. अलग-थलग स्थिति की समस्या - Page 171

156 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

8.374.- जिस किसी शूद्र ने किसी उच्च वर्ग की रक्षित या अरक्षित स्त्री

के साथ संभोग किया है, उसे निम्नलिखित रीति से दंड दिया जाए, यदि वह

अरक्षित थी तब उसका लिंग कटवा दिया जाए, यदि वह रक्षित थी तब उसे

प्राण-दंड दिया जाए और उसकी संपत्ति जब्त कर ली जाए।

8.20.- कोई भी ब्राह्मण जो जन्म से ब्राह्मण है, अर्थात् जिसने न तो वेदों

का अध्ययन किया है और न वेदों द्वारा अपेक्षित कोई कर्म किया है, वह राजा

के अनुरोध पर उसके लिए धर्म का निवर्चन कर सकता है, अर्थात् न्यायाधीश

के रूप में कार्य कर सकता है, लेकिन शूद्र यह कार्य नहीं कर सकता (चाहे

वह कितना ही विद्वान क्यों न हो)।

8.21.- जिस राज्य में उसका राजा दर्शक की भांति केवल देखता रहता

है उसी की ही उपस्थिति में शूद्र न्याय का विचार कर सकता है, यह राज्य

उसी प्रकार अधोगति को प्राप्त होता है जिस प्रकार गाय दलदल में नीचे को

धंस जाती है।

8.272.- अगर कोई शूद्र उद्दंतापूर्वक ब्राह्मण को धर्मोपदेश देने का साहस

करता है, तब राजा उसके मुंह और कानों में खौलता हुआ तेल डलवाए।

विद्या और ज्ञान के अर्जन के बारे में मनु का आदेश हैः

3.156.- जो कोई शूद्र शिष्यों को शिक्षा देता है और जिसका गुरु कोई

शूद्र है, वह श्राद्ध में निमंत्रित होने के अयोग्य हो जाता है।

4.99.- उसे शूद्रों की उपस्थिति में वेदों का कभी भी अध्ययन नहीं करना

चाहिए।

वेदाध्ययन करने पर शूद्र को कितना कठोर दंड दिया जाए, इस बारे में मनु के उत्तराधिकारी भी उसे मात कर गए। जैसे कि कात्यायन का कहना है कि शूद्र कहीं से भी वेद को सुन ले या वह वेद के एक शब्द के भी उच्चारण करने का साहस कर दे, तब राजा को चाहिए कि वह उसकी जीभ को चिरवा दे और उसके कानों में पिघला सीसा डलवा दे।

संपत्ति के बारे में शूद्र के लिए मनु की व्यवस्था हैः

10.129.- किसी भी शूद्र को संपत्ति का संग्रह नहीं करना चाहिए, चाहे

वह इसके लिए कितना ही समर्थ क्यों न हो, क्योंकि जो शूद्र धन का संग्रह

कर लेता है, उसे उसका मद हो जाता है, और वह अपने उद्धत या उपेक्षापूर्ण

व्यवहार से ब्राह्मणों को कष् पहुंचाता है।