अलग-थलग स्थिति की समस्या
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8.417.- यदि किसी ब्राह्मण का जीवन संकटग्रस्त हो, तो वह निस्संकोच शूद्र के धन को अधिग्रहीत कर ले।
शूद्र का केवल एक ही व्यवसाय है। इस संबंध में भी मनु का एक अकाट्य नियम है। मनु कहता हैः
1.91.- ब्रह्मा ने शूद्र के लिए एक ही कर्तव्य निर्धारित किया है कि वह विनम्रतापूर्वक इन तीन जातियों अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की सेवा करे।
10.21.- यदि कोई शूद्र (ब्राह्मणों की सेवा के द्वारा) अपना जीवन-निर्वाह करने में असमर्थ है और जीवन-निर्वाह का साधन चाहता है, तब वह किसी धनी वैश्य की भी सेवा कर अपना जीवन-निर्वाह करे।
10.122.- लेकिन शूद्र ब्राह्मणों की सेवा करे चाहे स्वर्ग के लिए हो या चाहे दोनों उद्देश्यों के लिए (अर्थात् इस जीवन और इससे अगले जन्म के लिए) हो क्योंकि वह जो ब्राह्मण का सेवक कहा जाता है, अपने सभी उद्देश्यों को प्राप्त कर लेता है।
10.123.- ब्राह्मणों की सेवा करना शूद्र के लिए एकमात्र उत्तम कर्म कहा गया है, क्योंकि इसके अतिरिक्त वह जो कुछ करता है, उसका इसे कुछ भी फल नहीं मिलता।
शूद्र द्वारा सेवा को मनु एक करार मानता है। यदि कोई शूद्र सेवा से इंकार करता है तो सेवा करने के लिए मजबूर किए जाने की भी व्यवस्था है। यह व्यवस्था इस प्रकार हैः
8.413.- ब्राह्मण शूद्र को चाहे तो खरीद कर या खरीदे बिना भी सेवा-कर्म करने के लिए बाध्य कर सकता है, क्योंकि ब्रह्मा ने शूद्रों की सृषि् ब्राह्मणों की सेवा करने के लिए की है।
10.124.- उनको चाहिए कि वे उसकी योग्यता, उसके परिश्रम और यह ध्यान में रखकर कि उसे कितने अश्रितों का पालन-पोषण करना है, अपने परिवार (की संपत्ति में से) उसके लिए उचित अंश जीवन-निर्वाह के लिए नियम करें।
10.125.- उसके लिए बचा हुआ भोजन और पुराने खाट-बर्तन आदि दिए जाएं।