परिशिष्ट - Page 179

164 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

चीजें देने से इंकार कर दिया और उन्हें दो दिन तक भूखा रखा गया। स्थिति तभी सुधरी, जब मालगुजारी के डिवीजनल अफसर ने बीच-बचाव किया।

हाल ही में दो हरिजनों तथा स्वयं मुझ पर सवर्ण हिंदुओं की एक टोली ने बर्बरतापूर्ण हमला किया। हमें उन्होंने लकड़ी के डंडों से पीटा। हमारा गुनाह बस यह था कि हमने तालाब में स्नान किया और हम चावड़ी के सामने एक कौफी-क्लब में गए थे। मदुरै के सरकारी अस्पताल में भर्ती करके हमारा इलाज किया गया। मेरी दाईं टांग में फ्रैक्चर हो गया। उसके कारण मैं दाईं टांग सेचल भी नहीं सकता था। ग्राम मुंसिफ समेत सोलह लोगों पर पुलिस ने दंगा करने का आरोप लगाया। लेकिन कुछ कांग्रेसजन समझौता कराने का प्रयास कर रहे हैं, क्योंकि उनके कुछ रिश्तेदार उसमें फंसे हुए हैं। पता चला है कि ये लोग इस संबंध में सिफारिश लेकर उच्च अधिकारियों तक पहुंचे हैं। कैसी विडंबना है, कहां महात्माजी की यह इच्छा, हरिजनों को अपना सगा भाई समझो। कहां यह स्थिति! अपना, अपना होता है_ पराया, पराया।

जहां तक हरिजनों के प्रति सवर्ण हिंदुओं के रवैये का संबंध है, हमारे हाथ लगती है, गिरी निराशा और हताशा। कहां गया महात्माजी का महान बलिदान! उन्होंने ही हमारे लिए स्वराज का द्वार खोला। वह चाहते हैं कि इन दलितों तक भी आजादी पहुंचे। राजस्व और पुलिस के अधिकारी हरिजनों की असुविधाओं को दूर करने के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। महात्माजी के सुपुत्र मणिलाल दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की नागरिक असुविधाओं को दूर कराने के लिए सत्याग्रह कर रहे हैं। हरिजनों को महात्माजी अपने ही जिगर का टुकड़ा समझते थे। आज उन्हें ही वैसी आजादी देने से हम कतरा रहे हैं। महात्माजी का गुणगान करने वाले सवर्ण हिंदुओं और कांग्रेसजनों को यह नहीं भूलना चाहिए कि उनकी आत्मा को शांति तो तभी मिलेगी, जब अस्पृश्यता के इस पाप को देश के चप्पे-चप्पे से जड़ से उखाड़ कर फेंक दिया जाएगा। सरकार को समझना चाहिए कि हमारे समाज से इस पाप को दूर करने के लिए ठोस प्रयत्न किए जाने जरूरी हैं।