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अलग-थलग स्थिति की समस्या

परिशिष् -II

हरिजनों पर जबरन अत्याचार (थुम्बापत्ती में दर्दनाक और शर्मनाक अत्याचार)

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हमारे गांवों में चावड़ी न्यायालय बंद करो

चावड़ी न्यायालय

हम सभी जानते हैं कि हालांकि तमिलनाडु के गांवों की चावडि़यों में हरिजन प्रवेश नहीं कर सकते, फिर भी इन चावडि़यों में सवर्ण हिंदू उनके भाग्य का फैसला करते हैं और उन पर इतने कठोर अत्याचार किए जाते हैं कि वे सवर्ण हिंदुओं से हमेशा डरे-डरे से रहते हैं हरिजनों की नागरिक असुविधाओं को दूर करने के लिए हम जो आंदोलन छेड़ते हैं, उसमें वे क्यों हिस्सा नहीं लेते, इसका एक कारण यह भी है कि उन्हें गांव के मुखिया (पेरियमबलगर) जो सवर्ण हिंदू होता है, के नेतृत्व में सवर्ण हिंदुओं द्वारा सताए जाने का बराबर डर बना रहता है। अनेक स्थानों पर ग्रामवासियों ने पंचायत सभा का नाम देकर अपने-अपने चावड़ी न्यायालय स्थापित कर रखे हैं। बेचारे हरिजनों को इन चावडि़यों में बुलाया जाता है और उन पर गुलामों की तरह मुकदमा चलाया जाता है। यदि उनमें से कोई पेरियमबलगर के आदेश का विरोध करता हे, तो जबरा कानून शुरू हो जाता है। बेरहमी से उनकी ठुकाई व पिटाई की जाती है, ताकि उनके मन में डर बिठाया जा सके और पेरियमबलगर की निरंकुश सत्ता का लोगों में प्रदर्शन किया जा सके। इन चावडि़यों में विभिन्न प्रकार की परिस्थिति और पेरियमबलगर व उसके सभासदों की इच्छा के अनुसार हरिजनों को दंड दिया जाता है- यथा, सरेआम कोड़े लगवाना, भारी जुर्माना करना और जुर्माना न देने पर उनकी संपत्ति जब्त कर लेना, झूठे मामले गढ़ना, रोजगार न देना और मजदूरी रोक कर आर्थिक बहिष्कार करना, सामाजिक समारोहों और धार्मिक उत्सवों में उनकी भागीदारी पर रोक लगाकर सामाजिक बहिष्कार करना, तालाबों और कुओं पर उनके प्रवेश पर रोक लगाकर उन्हें पानी न लेने देना, गांवों की दुकानों में बिक्री पर रोक लगाकर उन्हें खाने-पीने की चीजें न

खरीदने देना, आदि-आदि। हरिजनों का उद्धार तभी हो सकता है, जब सरकार उन ग्रामवासियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करे, जो ग्राम-पंचायत की आड़ में ये अवैध और अन्यायपूर्ण अदालतें चलाते हैं। पिछड़े तथा अल्पसंख्यक समुदाय पर उपर्युक्त तरीकों से तरह-तरह का जैसा उत्पीड़न गांवों में वहां के लोग कर रहे हैं, उसे कोई भी सभ्य सरकार सहन नहीं कर सकती।