166 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
थुम्बापत्ती में अत्याचार
एक अगस्त 1953 को थुम्बापत्ती में हरिजनों के साथ जो व्यवहार किया गया, उसे सुनकर किसका हृदय न पसीज उठेगा। इसका विवरण इस प्रकार है। यह गांव मदुरै से 22 मील दूर स्थित है और यह स्थान तमिलनाडु में हरिजनों के एक प्रमुख नेता, संसद-सदस्य श्री पी. कक्कन का जन्म स्थान है। पता चला है कि हरिजन बस्ती के सभी वयस्कों को चावड़ी के सामने खुले मैदान में बुलाया गया। सवर्ण हिंदुओं ने प्रथा के अनुसार पेरियमबलगर और उसकी परिषद के सामने साषंग प्रणाम किया। उसके बाद कोई एक दर्जन हरिजन युवकों को मुकदमे के लिए अलग छांट लिया गया। उन पर यह आरोप था कि लोगों को उन पर शक है कि वे गांव में चोरियां करते हैं। जिन युवकों ने थोड़ा-बहुत विरोध किया और सवर्ण हिंदुओं के आगे प्रथानुसार हाथ-पैर नहीं जोड़े, उन्हें दंड देने के लिए अलग से चुन लिया गया। उन्हें डंडों से मारा-पीटा गया और उनसे चोरी स्वीकार करने के लिए कहा गया। अन्य हरिजनों से पूछताछ की गई और कहा जाता है कि उत्पीड़न के डर से उन्होंने सभी चोरियों की जिम्मेदारी अभियुक्तों पर थोप दी। फैसला सुनाया गया कि ये युवक दोषी हैं। इसके बाद विधिवत दंड देने के लिए कुछ को हथकडि़यां भी पहना दी गईं। पता चला है कि उनमें से एक ने फिर भी विरोध प्रकट किया और बच निकलने के लिए बहाना बनाया। चावड़ी न्यायालय का अनादर करने पर गांव वाले नाराज हो गए। पता चला है कि पेरियमबलगर ने चावड़ी की ओर से यह निर्णय किया कि इन हरिजन युवकों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए। जबरा कानून की कार्रवाई शुरू हो गई और हरिजन युवकों की बड़ी बेरहमी से पिटाई की गई। जिन लोगों को हरिजनों से कोई शिकायत या विद्वेष था, उन सभी को बिना किसी दंड के भय के हरिजनों से गिन-गिनकर बदला लेने की खुली छूट मिल गई। जिस हरिजन युवक ने फिर भी बच निकलने की कोशिश की, उसके पैरों को पकड़ उसे पथरीली जमीन पर खूब घसीटा गया। दूसरों की डंडों से पिटाई की गई। उन्हें पेड़ों से बांध दिया गया और फिर इतनी बेरहमी से पीटा गया कि उनकी हड्डियों और पसलियां लगभग चूर-चूर हो गईं। कोई आठ घंटे तक उन्हें पेंरों से बांधकर खड़ा रखा गया, ताकि लोग उन्हें जी-भर कर देख लें। लगता है कि सभी हरिजनों को यह चेतावनी दे दी गई है कि वे हजिरन कार्यकर्ताओं से सहयोग न करें।