168 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हरिजन युवकों की हड्डियां दरअसल टूटी नहीं थीं। डंडों की मार तथा रस्सियों के बंधन के निशान उनके शरीरों पर कई दिन तक दीखते रहे। उनमें से दो को दो दिन तक अस्पताल में रखा गया और उनकी टांगों का एक्सरे किया गया, ताकि निश्चय किया जा सके कि उनकी हड्डियां टूटी नहीं। उनकी टांगों पर पलस्तर बांधकर भेज दिया गया। एक पखवाड़े तक वे ठीक तरह से चल भी नहीं सकें।
दो जांच-पड़ताल की गईं
डिप्टी कलक्टर के आदेश पर एक जांच-पड़ताल उप-कल्याण अधिकारी, मदुरै ने की और दूसरी जांच-पड़ताल हाल ही में सरकार के आदेश से राजस्व डिवीजनल अधिकारी, मदुरै ने की। परिणाम अभी तक पता नहीं चला है।
थुम्बापत्ती में नागरिक असमानताएं
1948 में जब सार्वजनिक तालाब से हरिजनों ने पानी लिया, तो थुम्बापत्ती के ग्रामवासियों ने भयंकर विरोध किया। तब तक हरिजन एक गंदे पोखर से पानी ले रहे थे। वहां लोग स्वयं नहाते थे और पशुओं को भी नहलाते थे। कुछ हरिजन युवकों को बुरी तरह मारा-पीटा गया और हरिजनों के घरों को आग लगाने की कोशिश की गई। कहा जाता है कि इस संबंध में अधिकारियों ने ग्राम के मुंसिफ तथा अन्य लोगों को चेतावनी दी है। थुम्बापत्ती में चाय की एक दुकान में हरिजन को कांच के गिलास में कौफी नहीं दी गई। इस मामले की सूचना पुलिस को 19 अगस्त, 1953 को दी गई। चाय की दुकान के मालिक को अपराधी माना गया और उस पर सब-मजिस्ट्रेट ने दस रुपये का जुर्माना किया। गांव का नाई कहता है कि वह हरिजनों की सेवा करने के लिए तैयार है। फिर भी हरिजन उसके पास नहीं जाते। संभवतः उसका कारण यह है कि सवर्ण हिंदुओं ने उन्हें गुप्त रूप से चेतावनी दी है। कुछ हरिजन 1 जुलाई, 1953 को नाई के पास गए थे और इस बात पर विश्वास करने के लिए सबूत हैं कि 1 अगस्त, 1953 को हरिजन युवकों के खिलाफ जो कार्रवाई की गई, वह हरिजनों में दहशत फैलाने की एक साजिश थी।
हमारा सामान्य अनुभव
आमतौर पर हमारा यह सामान्य अनुभव रहा है कि जब भी हरिजन अपने प्राथमिक अधिकारों को प्राप्त करने की कोशिश करते हैं तो ग्रामवासी उन्हें चावड़ी पर बुला लेते हैं और किसी न किसी रूप में उनको धमकते व मारते-पीटते हैं। उत्पीड़न की ऐसी घटनाएं मंगुलम, कुरुवनकुलम, अडानूर, पाथियेत्तमगुडी और