गुलाम-प्रथा और अस्पृश्यता
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में नीग्रो लोग सफल हो जाते हैं। जिस समय अश्वेत गुलामों की खरीद-फरोख्त
का चलन था तो क्या ओलीवर क्रोमवेल ने उन सभी आयरिश लोगों को बेच
नहीं दिया था जो फलोरिडा के ड्रोघेदा नरसंहार से बच बार्बेडोस भाग आए थे।
न्यूयार्क और पैंसिलवानिया के मुक्त और भगोड़े नीग्रो लोगों का इन लोगों के
साथ बराबर टकराव होता रहता था। इस टकराव का सबसे भयंकर रूप उन
दंगों में देखने के लिए मिला, जो न्यूयार्क में भड़क उठे थे। इन मूल आयरिश
लोगों का मकान बनाते समय बेलदार के रूप में काम पर और छोटे-बड़े कामों
पर एकाधिकार था। इसलिए वे नीग्रो लोगों की किसी भी ऐसी कोशिश पर
भड़क उठते, जो उन्हें अपनी रोजी-रोटी के लिए खतरा लगती।
III
यह रोमन गुलामों और अमरीका के नीग्रो गुलामों की यथार्थ स्थिति थी। क्या भारत में अस्पृश्यों की स्थिति में कहीं कोई ऐसी बात है, जिसकी रोमन गुलामों और नीग्रो गुलामों की स्थिति से तुलना की जा सके? अगर हम रोमन और नीग्रो गुलामों की स्थिति के साथ अस्पृश्यों की स्थिति की तुलना करने के लिए समान युग का चयन करें तो यह अनुचित नहीं होगा। लेकिन मैं आज के अस्पृश्यों की तुलना गुलामों की उस दशा से करना अनुचित नहीं समझता, जो रोमन साम्राज्य में उनकी थी। यह तुलना ऐसी होगी कि हम बदतर स्थिति की तुलना किसी श्रेष् स्थिति से कर रहे हैं, क्योंकि अस्पृश्यों के संबंध में उनकी आज की स्थिति स्वर्णिम स्थिति समझी जाती है। आज की अस्पृश्यों की वास्तविक स्थिति गुलामों की वास्तविक स्थिति से कितनी भिन्न है? आज कितनी संख्या में अस्पृश्य लायब्रेरियन, स्टेनोग्राफर आदि जैसे व्यवसायों में लगे हुए हैं, जितने कि इन व्यवसायों में रोम में गुलाम नियुक्त थे? आज कितने अस्पृश्य वाकपटु, भाषाविज्ञानी, दार्शनिक, अध्यापक, डाक्टर और कलाकार हैं और बौद्धिक कार्यकलाप करते हैं, जैसा कि रोम में गुलाम किया करते थे। क्या रोम के गुलामों की तरह भारतीय अस्पृश्यों से ये काम कराए जाते हैं, क्या कोई हिंदू ऐसी हिम्मत रखता है कि इन प्रश्नों का उत्तर ‘हां’ कह कर दे? अस्पृश्यों के लिए ये सारे रास्ते पूरी तरह बंद हैं, जब कि रोमन गुलामों के लिए ये पूरी तरह खुले हुए थे। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि हिंदू अस्पृश्यता को उचित ठहराने के लिए जो दलील देते हैं, कितनी सारहीन है। दुख तो इस बात का है कि अधिकांश लोग गुलामी को मात्र इसलिए बुरा बताते हैं कि इसमें कानून