22 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
द्वारा एक व्यक्ति के जीवन का जो अधिकार दूसरे को सौंप दिया जाता है, वह गलत है। वे यह भूल जाते हैं, चाहे गुलाम-प्रथा हो या न हो, जुल्म, उत्पीड़न, क्रूरता और प्रताड़ना बनी ही रहती है, जिससे पीड़ा, हताशा और नैराश्य का जन्म होता है। जो लोग गुलामों की उपरोक्त यथार्थ स्थिति पर विचार करेंगे, उन्हें यह मानना पड़ेगा कि गुलाम-प्रथा को उसकी कानूनी अवधारणा पर हल्के- फुल्के ढंग या तपाक से बुरा कह देना निरर्थक बात होगी। जो कुछ कानून अनुमति देता है, वह समाज में प्रचलित व्यवस्था का साक्ष्य नहीं है। बहुत से गुलाम यह स्वीकार कर लेंगे कि उनके पास जो कुछ है, वह गुलाम-प्रथा के कारण ही है, और बहुतों ने संपदा अर्जित की, चाहे उन्होंने इस तथ्य को स्वीकार किया हो अथवा नहीं।
यह अवश्य स्वीकार किया जाना चाहिए कि गुलाम-प्रथा कोई स्वतंत्र समाज-व्यवस्था नहीं है। किंतु क्या अस्पृश्यता एक स्वतंत्र-व्यवस्था है? जो हिंदू अस्पृश्यता का समर्थन करते हैं, निस्संदेह वे कहेंगे कि ‘हां, यह स्वतंत्र समाज-व्यवस्था है।’ वे यह भूल जाते हैं कि गुलामी और अस्पृश्यता में अनेक प्रकार के अंतर हैं, और इनके कारण ही अस्पृश्यता परतंत्र समाज-व्यवस्था का सबसे अधिक कुत्सित रूप है। गुलामी कभी अनिवार्य नहीं रही, परंतु अस्पृश्यता अनिवार्य व्यवस्था है। कोई व्यक्ति किसी को भी गुलाम के रूप में रख सकता था। यदि वह किसी को गुलाम न रखना चाहे, तब उस पर ऐसा न करने की कोई पाबंदी नहीं। परंतु अस्पृश्यता के संबंध में कोई विकल्प नहीं। अगर कोई एक बार अस्पृश्य के घर में जन्म ले ले, तब वह सब तरह से अस्पृश्य हो जाएगा। गुलाम-प्रथा के कानूनों में मुक्ति का विधान है। कोई व्यक्ति यदि एक बार गुलाम हो गया, तो यह आवश्यक नहीं कि वह जीवन-भर गुलाम ही रहेगा। अस्पृश्य होने पर वह उससे बच नहीं सकता। एक बार अस्पृश्य, तो हमेशा के लिए अस्पृश्य। दूसरा अंतर यह है कि अस्पृश्यता गुलामी का एक अप्रत्यक्ष रूप है और इसलिए अत्यंत कुत्सित है। किसी व्यक्ति को उसकी स्वतंत्रता से खुले तौर पर और प्रत्यक्ष रीति से वंचित कर देना गुलाम बनाने की बेहतर प्रथा है। इससे एक गुलाम को अपनी गुलामी का अहसास रहता है और यह प्रतीति ही आजादी की लड़ाई का सबसे पहला ओर अमोघ अस्त्र है। परंतु यदि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता अप्रत्यक्ष रीति से छीन ली जाए, तब उसे अपने गुलाम होने का अहसास ही नहीं होगा। अस्पृश्यता गुलाम-प्रथा का एक अप्रत्यक्ष रूप है। किसी अस्पृश्य से कहा जाए कि ‘तुम स्वतंत्र हो, तुम एक नागरिक हो, तुमको नागरिकता के सभी अधिकार प्राप्त है’ और उसे रस्सी से इस तरह बांध दिया