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गुलाम-प्रथा और अस्पृश्यता

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जाए कि वह स्वतंत्र होने का अनुभव भी न कर सके, तब यह निर्दयतापूर्वक धोखा देना है। अस्पृश्यों को उनकी गुलामी का अहसास न होने देना उनको गुलाम बनाना है। यह अस्पृश्यता है, तो भी यह गुलामी है। यह यथार्थ है, हालांकि यह अप्रत्यक्ष है। यह अव्यक्त है इसलिए यह स्थाई है। इन दोनों व्यवस्थाओं में से अस्पृश्यता निस्संदेह बुरी है।

न तो गुलामी ही स्वतंत्र समाज-व्यवस्था है और न ही अस्पृश्यता। परंतु यदि इन दोनों में अंतर किया जाए, और इस बात में कोई संदेह भी नहीं है कि इन दोनों में अंतर है, तो इस अंतर की कसौटी यह होगी कि क्या गुलामी की स्थिति में शिक्षा, नैतिक आदर्श, सुख, संस्कृति और समृद्धि संभव है, या यह अस्पृश्यता की स्थिति में संभव है। अगर इस कसौटी पर इन दोनों स्थितियों को परखा जाए, तब निस्संदेह यह पता चलेगा कि गुलामी की स्थिति सौ दर्जे अच्छी है। गुलामी में शिक्षा, नैतिक आदर्श, सुख, संस्कृति और समृद्धि की गुंजाइश है। अस्पृश्यता में तो इनमें से किसी की गुंजाइश नहीं। अस्पृश्यता में गुलामी जैसी परतंत्र समाज-व्यवस्था के लाभ की कोई संभावना नहीं। इसमें स्वतंत्र व्यवस्था की सारी हानियां विद्यमान हैं। गुलामी जैसी परतंत्र समाज-व्यवस्था में कुछ लाभ भी हैं, जैसे व्यापार, दस्तकारी या कला का अनुभव, या जैसा कि प्रोफेसर मूरेस ने इसे ‘उच्च संस्कृति की दीक्षा का सोपान’ कहा था। गुलामी की प्रथा में, विशेषकर जो प्रथा रोमन साम्राज्य में प्रचलित थी, उसमें अस्पृश्यता को समाप्त करने या व्यक्तिगत विकास की बाधाओं की अस्वीकृति का प्रश्न ही नहीं हुआ। इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि गुलामी की प्रथा अस्पृश्यता से बेहतर है।

इस प्रकार यह प्रशिक्षण, संस्कृति से परिचय निस्संदेह गुलामों के लिए एक बहुत बड़ी नियामत थी। इसमें मालिकों को अपने गुलामों के प्रशिक्षण और उन्हें सुसंस्कृत करने पर काफी धन खर्च करना पड़ता था। ‘गुलामों के रूप में रखने से पूर्व बहुत कम गुलाम ऐसे मिलते थे, जो शिक्षित या दीक्षित होते थे। इसका उपाय यही था कि उन्हें छोटी अवस्था से ही घरेलू कामों में प्रशिक्षित कर दिया जाए या कारीगरी सिखा दी जाए, जैसा कि साम्राज्य की स्थापना के पूर्व कुछ मात्रा में ज्येष् काटो ने किया था। यह प्रशिक्षण उनके मालिकों और उनके यहां मौजूद कार्मिकों द्वारा दिया जाता था। दरअसल अमीर घरों में विशेष प्रशिक्षक होते थे। यह प्रशिक्षण कई प्रकार के क्षेत्रों में दिया जाता था, जैसे उद्योग, व्यापार, कला और साहित्य।’