3. गुलाम-प्रथा और अस्पृश्यता - Page 39

24 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

ये मालिक अपने गुलामों को अच्छे से अच्छे कामों और संस्कृति में क्यों प्रशिक्षित करते थे, निस्संदेह उनका उद्देश्य इनसे आर्थिक लाभ प्राप्त करना होता था। कुशल श्रमिक अकुशल श्रमिक की तुलना में अधिक मूल्यवान मद होती थी। उसे बेचने पर उसकी कीमत ज्यादा मिलती और भाड़े पर चढ़ाने पर उसकी मजदूरी भी ज्यादा मिलती थी। इसलिए मालिकों द्वारा गुलामों को शिक्षित करना मानो पूंजी निवेश करना था।

गुलाम-प्रथा जैसी परतंत्र समाज-व्यवस्था में गुलामों का भरण-पोषण करना और उन्हें स्वस्थ रखना उनके मालिकों का दायित्व था। गुलाम को अपने भोजन, कपड़ों और अपनी रिहायश के बारे में चिंता से मुक्त रखा जाता था। इस सबकी व्यवस्था करने के लिए मालिक बाध्य होता था। यह उसके मालिक के लिए बोझ नहीं होता था, क्योंकि गुलाम अपने ऊपर होने वाले खर्च से ज्यादा कमा लेता था। लेकिन हर स्वतंत्र व्यक्ति के लिए अपनी रोजी-रोटी और मकान की कोई सुरक्षित व्यवस्था हमेशा संभव नहीं होती है, क्योंकि श्रमिक अपनी-अपनी कीमत जानते हैं। जो काम करने के लिए तैयार है, उस तक को काम नहीं मिलता और श्रमिक के संबंध में ऐसा कोई नियम भी नहीं है, जिसके अधीन उसे उन दिनों तक दाना-पानी मिल सके, जब तक उसे कोई काम नहीं मिल जाता है। यह नियम कि काम नहीं तो रोटी नहीं, गुलामों पर नहीं लागू होता है। उसके लिए रोटी के साथ-साथ काम ढूंढने की जिम्मेदारी मालिक पर होती है। अगर मालिक उसके लिए काम ढूंढने में असफल रहता है, तो इससे गुलाम का अपने लिए रोटी मिलने का अधिकार नहीं छिन जाता है। व्यापार में उतार-चढ़ाव, लाभ और हानि सामान्य परिवर्तन हैं, जिन्हें हर स्वतंत्र श्रमिक को भोगना होता है। लेकिन इनका गुलामों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इनका प्रभाव उसके मालिक पर तो पड़ सकता है, लेकिन गुलाम इन सबसे मुक्त है। उसे अपनी रोटी, शायद वही रोटी मिलती है, चाहे लाभ के दिन हों या घाटा हो रहा हो।

गुलाम-प्रथा जैसी परतंत्र समाज-व्यवस्था में गुलाम के स्वास्थ्य और उसके कुशल-क्षेम का ध्यान रखने के लिए उसका मालिक बाध्य है। गुलाम, मालिक की संपत्ति था। लेकिन गुलामों की यही निर्भरता स्वतंत्र व्यक्ति के मुकाबले उनके लिए वरदान बन गई। वे संपत्ति स्वरूप थे, इसलिए मूल्यवान थे। मालिक अपने हित में गुलामों के स्वास्थ्य और उनके कुशल-क्षेम का पूरा ध्यान रखते थे। रोम में गुलामों को दलदली इलाकों या मलेरिया-ग्रस्त क्षेत्रों में कभी नहीं भेजा जाता था। ऐसे क्षेत्रों में स्वतंत्र व्यक्ति भेजे जाते थे। काटो ने रोमन किसानों को सलाह दी थी कि वे कभी भी अपने गुलामों को दलदली या मलेरिया-ग्रस्त