गुलाम-प्रथा और अस्पृश्यता
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क्षेत्रों में न भेजें। यह अजीब-सा लगता है। परंतु जरा-सा ध्यान देने पर ही पता चल जाएगा कि यह स्वाभाविक भी था। आखिर गुलाम उनकी मूल्यवान संपत्ति होते थे। इसलिए कोई समझदार मालिक जिसे अपने हित का ज्ञान है, अपनी मूल्यवान संपत्ति को मलेरिया से क्यों तबाह होने दे। परंतु जो गुलाम नहीं थे, उनकी किसे परवाह थी क्योंकि वे किसी की संपत्ति थोड़े ही होते थे? इस कारण गुलामों को बड़ी सुविधा प्राप्त थी। उनका इतना ध्यान रखा जाता था, जितना और किसी का नहीं रखा जाता।
अस्पृश्यों को परतंत्र समाज-व्यवस्था की उक्त इन तीनों सुविधाओं में से कोई भी सुविधा प्राप्त नहीं है। उच्चतर अध्ययन के क्षेत्र में अस्पृश्य का कोई प्रवेश नहीं है, उसके लिए सभ्य जीवन के कोई रास्ते नहीं खुले हुए हैं। उसका काम सिर्फ सफाई करना है। उसे और कुछ नहीं करना है। अस्पृश्यता का अर्थ उसकी रोजी-रोटी की सुविधा नहीं है। हिंदुओं में से कोई भी अस्प्ृश्य को रोजी-रोटी, मकान व कपड़ा करने के लिए जिम्मेदार नहीं है। अस्पृश्य का स्वास्थ्य किसी की जिम्मेदारी नहीं। अस्पृश्य की मौत शुभ मानी जाती है। एक हिंदू कहावत है - ‘अस्पृश्य मरा गंद हटा’।
दूसरी तरफ, अस्पृश्य के लिए स्वतंत्र समाज-व्यवस्था की सभी बलाएं उसकी तकदीर में लिखी हैं। स्वतंत्र समाज-व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन के लिए संघर्ष करना पड़ता है। उसकी यही जिम्मेदारी स्वतंत्र समाज-व्यवस्था का सबसे बड़ा अभिशाप है। कोई इस उत्तरदायित्व को पूरा कर पाता है या नहीं, यह समान अवसर और समान व्यवहार मिलने पर निर्भर करता है। हालांकि अस्पृश्य एक स्वतंत्र व्यक्ति होता है, तो भी उसे समान अवसर नहीं मिलते और न उसके साथ राग-द्वेष से मुक्त व्यवहार ही होता है। इस दृषि् से अस्पृश्यता गुलाम-प्रथा की तुलना में न केवल बदतर है, बल्कि यह निश्चय ही एक क्रूर कर्म है। गुलामी की प्रथा में गुलाम के लिए रोजी ढूंढने की जिम्मेदारी उसके मालिक की होती है। स्वतंत्र मजदूर व्यवस्था में रोजी प्राप्त करने के लिए मजदूरों को अपने साथियों का मुकाबला करना पड़ता है। इस धक्का-मुक्की में अस्पृश्य के लिए अवसर कहां? संक्षेप में, जिस प्रतियोगिता में सामाजिक कलंक के कारण अस्पृश्य का पक्ष निर्बल हो, तब जिन्हें रोजगार दिया जाएगा, उनकी सूची में उसका आखिरी नंबर होगा और जिन लोगों को निकाला जाना है, उनमें उसका प्रथम स्थान होगा। गुलाम-प्रथा की तुलना में अस्पृश्यता इसलिए क्रूर कर्म है कि इससे अस्पृश्यों पर अपने लिए रोजी कमाने का दायित्व डाल दिया जाता है, जब कि रोजी कमाने के दरवाजे उनके लिए पूरी तरह खुले नहीं होते।