3. गुलाम-प्रथा और अस्पृश्यता - Page 41

26 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

सारांश यह है कि हिंदू, अस्पृश्यों को गुलामों की स्थिति से भिन्न उन स्थितियों में अपना मानते हैं, जिनसे उनके स्वार्थ की पूर्ति होती है और जब उन्हें अपने साथ रखने में उनका स्वार्थ आड़े आ जाता है और वे बोझ लगने लगते हैं, तब वे उनको अपना कहने और अपने बराबर रखने से इंकार कर देते हैं। अस्पृश्य, परतंत्र समाज-व्यवस्था के किसी लाभ के अधिकारी होने का दावा नहीं कर सकते, उन्हें स्वतंत्र समाज-व्यवस्था की सभी मुसीबतों को स्वयं ढोने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया जाता है।

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