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भारत की बहिष्कृत बस्तियांµ
अस्पृश्यता की केन्द्रµ
समाज से बाहर
हिंदू समाज-व्यवस्था में अस्पृश्यों की सामाजिक स्थिति क्या है? उनकी स्थिति की सही जानकारी देना ही इस अध्याय का मुख्य उद्देश्य है। लेकिन हिंदू समाज-व्यवस्था में अस्पृश्य किस प्रकार रहते हैं या उन्हें किस प्रकार रहने के लिए मजबूर किया जाता है, इसका यथार्थ और प्रत्यक्ष चित्र उनके सम्मुख प्रस्तुत करने के लिए सबसे अच्छा माध्यम ढूंढ निकालना कोई आसान काम नहीं है। एक उपाय यह है कि हम हिंदू समाज-व्यवस्था का एक माडल बना लें और तब उसमें उनकी उस स्थिति को प्रदर्शित करें, जो उन्हें यहां दी गई है। इसके लिए हिंदुओं के किसी गांव जाना आवश्यक है। हमारे उद्देश्य की पूर्ति के लिए अच्छा उपाय और कोई नहीं है। हिंदुओं का गांव हिंदुओं की समाज-व्यवसथा की मानो प्रयोगशाला है। गांव में हिंदू समाज-व्यवस्था का पूरा-पूरा पालन होता है। जब कभी कोई हिंदू भारतीय गांवों का जिक्र करता है, तो वह उल्लास से भर उठता है। वह उन्हें समाज-व्यवस्था का आदर्श रूप मानता है। उसकी यह पक्की धारणा है कि संसाद में इसकी कोई तुलना नहीं। कहा जाता है कि सामाजिक संगठन के सिद्धांत में भारतीय गांवों का एक विशेष योगदान है, जिसके लिए भारत गर्व कर सकता है।
हिंदू अपनी इस धारणा के बारे में कि भारतीय गांव सामाजिक संगठन के आदर्श रूप हैं, कितने कट्टर होते हैं, इसका अनुमान भारतीय संविधान सभा के हिंदू सदस्यों के धुंआधार भाषणों से लगाया जा सकता है, जो उन्होंने अपने इस मत के समर्थन में दिए थे कि भारतीय संविधान में भारतीय गांवों को स्वायत्त प्रशासनिक इकाइयों के संवैधानिक पिरामिड के आदर्श के रूप में स्वीकार किया