4. भारत की बहिष्कृत बस्तियां-अस्पृश्यता की केन्द्र-समाज से बाहर - Page 44

समाज से बाहर

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करने वालों का सफलतापूर्वक मुकाबला कर लेंगे। मैं सोचता हूं कि गांव के

लोगों का इस प्रकार संगठित होना और अपने लिए एक छोटी-मोटी शासकीय

इकाई बनाना सभी प्रकार की उथल-पुथल और उलट-फेर के बावजूद भारत

की जनता के संरक्षण में जितना सहायक हुआ, उतना कोई और तत्व नहीं

हुआ और इसी के कारण यहां की जनता खुशहाल रही, उसने आजादी का

सुख भोगा।’’

हिंदुओं ने भारतीय गांवों के बारे में जब अंग्रेज सरकार के एक अधिकारी का यह वर्णन पढ़ा, तब वे फूलकर कुप्पा हो गए, उन्होंने इसे अपना वास्तविक गुण समझा। भारतीय गांवों के बारे में इस दृष्किण को अपना कर हिंदुओं ने अपनी बुद्धि या ज्ञान के प्रति न्याय नहीं किया, बल्कि उन्होंने अपनी कमजोरी ही प्रकट कर दी। चूंकि बहुत से विदेशी भारतीय गांवों के बारे में इसी आदर्शपरक दृष्किण को सही मान लेते हैं, इसलिए समाज की असली तस्वीर पेश करना उचित होगा, जैसी कि हर किसी को भारतीय गांवों में मिलती है।

भारतीय गांव अलग से सामाजिक इकाई नहीं है। उसमें भिन्न-भिन्न जातियां होती हैं। परंतु हमारे प्रयोग के लिए यह कहना र्प्याप्त हैः

  1. गांव में दो तरह की आबादी होती है - (क) स्पृश्य, और (ख)

अस्पृश्य।?

  1. स्पृश्य लोगों की संख्या अधिक और अस्पृश्य लोगों की संख्या थोड़ी होती

है।

  1. स्पृश्य लोग गांव में रहते हैं और अस्पृश्य गांव के बाहर अलग-अलग घर

बनाकर रहते हैं।

  1. आर्थिक दृषि् से स्पृश्य लोग सबल और शक्तिशाली होते हैं, जब कि

अस्पृश्य लोग गरीब और पराश्रित होते हैं।

  1. स्पृश्य लोग सामाजिक दृषि् से शासकों की जाति होती है, जब कि अस्पृश्य

लोग पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे बंधुआ लोगों की जाति होती है।

भारत के गांवों में रहने वाले इन स्पृश्य और अस्पृश्य लोगों के बीच आपसी व्यवहार की शर्तें क्या होती हैं? प्रत्येक गांव में स्पृश्य लोगों की एक आचार-संहिता होती है, जिसका अस्पृश्यों को पालन करना होता है। यह संहिता उन कार्यों को निश्चित करती है, जिनको करने या न करने पर अस्पृश्य लोगों का अपराध माना जाता है। इन अपराधों की सूची निम्नलिखित हैः