समाज से बाहर
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- अगर कोई अस्पृश्य किसी श्ुभ दिन गांव में आकर बातचीत करता फिरता
है जब हिंदू व्रत कर रहे हों या जब वे अपना व्रत पूरा कर अन्न-जल
ग्रहण कर रहे हों, तब वह अपराध करता है, क्योंकि उसके मुख से निकली
श्वास से केवल वातावरण दूषित होता है बल्कि हिंदुओं का आहार भी
दूषित हो जाता है।
- अगर कोई अस्पृश्य स्पृश्य व्यक्तियों के जैसे चिह्न धारण करता है और
अपने को स्पृश्य जैसा प्रदर्शित करता घूमता है, तब वह अपराध करता
है।
- अस्पृश्य को चाहिए कि वह हीन व्यक्त्यिं के स्तर के अनुरूप दिखे और
उसे प्रत्यक्ष रूप में हीनता दर्शाने वाले ऐसे नाम आदि धारण करने चाहिएं,
जिनसे लोग उसे तदनुरूप पहचान सकें। जो इस प्रकार हैं-
(क) हीनता-सूचक नाम रखना।
(ख) स्वच्छ वस्त्र न पहनना।
(ग) बिना खपरैल वाले घर में रहना।
(घ) चांदी-सोने के जेवर न पहनना।
इनमें से किसी भी नियम का उल्लंघन करना अपराध है।
इसके बाद हम उन कर्तव्यों को लेते हैं, जो इस संहिता के अनुसार अस्पृश्यों को स्पृश्यों के लिए करने अपेक्षित हैं। इस शीर्षक के अंतर्गत निम्नलिखित कार्यों को रखा जा सकता हैः
- अस्पृश्य जाति के व्यक्ति को चाहिए कि वह किसी भी हिंदू के घर की
घटना, जैसे-मृत्यु या विवाह की सूचना दूसरे गांवों में रहने वाले उसके
सगे-संबंधियों तक पहुंचाए, चाहे वह गांव कितनी ही दूर क्यों न हो। 2. अस्पृश्यों को चाहिए कि हिंदू के घर में विवाह के अवसर पर ऐसे कार्य,
जैसे लकड़ी चीरना या आने-जाने का कार्य करे।
- अस्पृश्य को चाहिए कि जब हिंदू की लड़की अपने पिता के घर से पति
के गांव जा रही हो तो वह उसके साथ जाए चाहे वह गांव कितनी ही
दूर क्यों न हो।
- जब सारा गांव बड़े-बड़े त्यौहार, जैसे होली और दशहरे का त्यौहार, की
तैयारी कर रहा हो, तब अस्पृश्यों को चाहिए कि वे नौकरों द्वारा किए