4. भारत की बहिष्कृत बस्तियां-अस्पृश्यता की केन्द्र-समाज से बाहर - Page 48

समाज से बाहर

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कई कारण हैं। पहली बात तो यह है कि जमीन खरीदना उनके वश की बात नहीं, और दूसरी यह कि यदि अस्पृश्य जमीन खरीदने की स्थिति में है, तो भी वह ऐसा नहीं कर सकता। देश के अधिकांश भागों में हिंदू इस बात को बर्दाश्त नहीं कर सकते कि अस्पृश्य जाति का कोई व्यक्ति जमीन खरीदकर स्पृश्य जाति की बराबरी का प्रयत्न करे। किसी अस्पृश्य के ऐसे दुस्साहस का विरोध ही नहीं किया जाता, बल्कि उसको सजा भी भुगतनी पड़ सकती है। कुछ भागों में तो उनके जमीन खरीदने पर कानूनी प्रतिबंध है। उदाहरणार्थ, पंजाब प्रांत में एक कानून है जिसका नाम है, भूमि स्वामित्व अधिनियम। इस कानून में उन जातियों का उल्लेख किया गया है, जो जमीन खरीद सकती हैं और अस्पृश्यों को इस सूची में शामिल नहीं किया गया है। इसके परिणामस्वरूप अधिकांश भागों में अस्पृश्य भूमिहीन मजदूर रहने के लिए विवश हैं और मजदूर के रूप में वे वाजिब मजदूरी की मांग नहीं कर सकते। वे हिंदू किसानों के लिए उसी मजदूरी पर काम करने को मजबूर हैं, जो उन्हें मालिक देना चाहे। इस प्रश्न पर हिंदू किसान मजदूरी कम से कम रखने के लिए आपस में एकमत हो जाते हैं, क्योंक यह उनके हित में होता है। दूसरी ओर अस्पृश्यों के पास कोई चारा नहीं रहता। वे या तो उसी मजदूरी पर काम करें अथवा भूखों मरें। न ही उनमें मोत-तौल करने की क्षमता होती है। वे या तो निश्चित की हुई दरों पर काम करें या फिर पिटाई के लिए तैयार रहें।

अस्पृश्यों को उनकी मजदूरी नकद या अनाज के रूप में दी जाती थी। उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में मजदूरी के रूप में दिए जाने वाले अनाज को ‘गोबरहा’ कहा जाता है। इसका अर्थ है, जानवरों के गोबर से निकलने वाला अनाज। मार्च या अप्रैल के महीने में जब फसल पूरी तरह पक जाती है तो उसे काटकर खलिहान में फैला दिया जाता है। उस पर बैलों की दांय चलती है, ताकि उनके चलने से भूसा अनाज से अलग हो जाए। दांय पर चलते बैल बहुत-सा अनाज और लांक खा जाते हैं। जब वे जरूरत से ज्यादा खा लेते हैं, तो अनाज को पचाना मुश्किल होता है। अगले दिन वही अनाज गोबर के साथ निकल जाता है। गोबर को इकट्ठा कर लिया जाता है और उसमें से अनाज निकाल लिया जाता है। यही अनाज मजदूरी के रूप में अस्पृश्य मजदूरों को दे दिया जाता है, जिसे पीसकर वे रोटी बना लेते हैं।

जब फसल का समय गुजर जाता है और अस्पृश्यों के पास रोजी-रोटी का कोई साधन नहीं होता तो वे घास काटते हैं और जंगलों से ईंधन इकट्ठा कर आस-पास के शहरों में बेच आते हैं। परंतु यह भी वन-रक्षकों के ऊपर निर्भर