34 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
करता है। जब उसकी मुट्ठी गरम की जाएगी, तभी वह उन्हें सरकारी जंगलों में घास और लकड़ी काटने देता है। जब वे शहर में आते हैं तो उनका मुकाबला
खरीददारों से होता है। ये खरीददार भी हिंदू ही होते हैं, जो हमेशा मजदूरी कम रखने की कोशिश में रहते हैं। चूंकि उनमें अपने माल को रोके रखने की सामर्थ्य नहीं होती, इसलिए उन्हें अपना माल उसी कीमत पर बेचना पड़ जाता है, जो भी उन्हें बताई जाती है। कभी-कभी तो उन्हें अपने गांव से शहरों तक दस-दस मील तक बोझ लेकर जाना पड़ता है।
ऐसा कोई व्यवसाय नहीं है, जिससे वे अपनी रोजी-रोटी कमा सकें। उनके पास इसके लिए न तो पूंजी होती है, और यदि हो भी तो, कोई भी उनसे सामान नहीं खरीदता।
आमदनी के ये सभी साधन स्पष्तः अनिश्चित और अस्थाई होते हैं। इनमें कोई गारंटी नहीं होती है। देश के कुछ भागों में जिन्हें में जानता हूं, अस्पृश्यों के लिए रोजी-रोटी का केवल एक ही स्थाई साधन है। यह है, गांव के हिंदू किसानों से
खाना मांगने का अधिकार। हर गांव का अपना अलग शासन-तंत्र होता है। गांव की व्यवस्था के अनुसार अस्पृश्य पुश्तैनी नौकर-चाकर होते हैं। मजदूरी के अंश के रूप में सारे अस्पृश्यों को मिलाकर जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा मिलता है, जो उन्हें बहुत पहले दिया गया था जो निश्चित होता है, जिसमें कभी बढ़ोतरी नहीं की गई, और जिसे अस्पृश्य भी बगैर खेती किए छोड़ देना बेहतर समझते हैं, क्योंकि उसके भी छोटे-छोटे टुकड़े हो गए होते हैं। इस कारण उन्हें भीख मांगने का अधिकार ही मिलता है।
यह बात चाहे कितनी ही खेदजनक क्यों न हो, यह अधिकार उनका परंपरागत अधिकार बन गया है और सरकार भी अस्पृश्य का वेतन तय करते समय, चाहे वह सरकारी पद पर ही क्यों न नियुक्त हो, अस्पृश्य को मिलने वाली भीख की कीमत को अपने ध्यान में रखती है।
भारत में इस समय स्पृश्यों से भीख मांगकर खाना छह करोड़ अस्पृश्यों की जीविका का मुख्य आधार है। अगर कोई किसी गांव में उस समय जाए जब लोग शाम का खाना खा चुके होते हैं, तब वह अस्पृश्यों के झुंड के झुंड रटे-रटाए ढंग से गुहार करते हुए भीख मांगते हुए देख सकता है।
यह विधिसम्मत भिक्षा-वृत्ति अस्पृश्यों के लिए एक प्रथा बन चुकी है। गांव में स्पृश्यों के परिवार के साथ अस्पृश्यों के परिवारों का वैसा ही संबंध होत है, जैसा मध्यकालीन यूरोप में लार्ड्स आफ मैनर्स और उनके अधीन सर्फस और मिलेंस के