4. भारत की बहिष्कृत बस्तियां-अस्पृश्यता की केन्द्र-समाज से बाहर - Page 50

समाज से बाहर

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बीच होता था। स्पृश्य लोगों के परिवारों के साथ जुड़े अस्पृश्य लोगों के परिवार उनके यहां काम करते थे। ये संबंध इतने गहरे हो गए हैं कि जब कोई स्पृश्य हिंदू किसी अस्पृश्य की बात करता है तो वह उसे ‘मेरा आदमी’ कहता है, जैसे कि वह उसका गुलाम हो। यह संबंध-सूत्र ही स्पृश्य परिवारों के यहां अस्पश्य लोगों द्वारा भीख मांगकर खाना खाने की प्रथा को स्थाई प्रथा बनाने में सहायक हुआ।

यही हैं हमारे ग्रामीण गणराज्य, जिन पर हिंदुओं को इतना नाज है। इन गणराज्यों में अस्पृश्यों की क्या स्थिति है? वे दुमछल्ला तो क्या, पैर की जूती भी नहीं हैं। उनको दीन-हीन बना दिया गया है उन्हें हर तरह से इतना दीन-हीन बना दिया गया है कि बहुसंख्यक उन पर राज कर सकें। यह विपन्नता किसी एक व्यक्ति या परिवार की नहीं, बल्कि उनके पूरे समुदाय की नियति है। अस्पृश्य हर स्पृश्य से तुच्छ है, चाहे उसकी आयु कुछ भी क्यों न हो, वह कितना भी योग्य क्यों न हो। एक स्पृश्य हिंदू युवक किसी भी वृद्ध अस्पृश्य से उच्च है। पढ़ा-लिखा अस्पृश्य भी उस स्पृश्य से हीन है, जिसके लिए काला अक्षर भैंस बराबर है।

स्पृश्य द्वारा दिया गया आदेश कानून है। अस्पृश्यों को इस बात से और कुछ लेना-देना नहीं सिवाय इसके कि वे उसका पालन करें और उसे शिरोधार्य करें।

स्पृश्यों के विरुद्ध अस्पृश्यों को कोई अधिकार प्राप्त नहीं। उन्हें न कोई समान अधिकार प्राप्त है और न ही कोई न्याय, जिसके द्वारा उन्हें वह सब-कुछ दिया जा सके, जो उन्हें देय है। उन्हें उसके सिवा कुछ भी देय नहीं है, जो स्पृश्य उन्हें देने के लिए सहमत हैं। अपनी ओर से अस्प्ृश्यों को अपने लिए कुछ भी अधिकार नहीं मांगने चाहिए। उनको स्पृश्यों से उनकी कृपा और अनुकंपा के लिए विनती करनी चाहिए। उन्हें जो कुछ मिले, उसी से संतोष करना चाहिए।

यह व्यवस्था हैसियत और व्यवहार, दोनों ही दृष्यिं से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। एक बार स्पृश्य तो हमेशा के लिए स्पृश्य। एक बार अस्पृश्य तो हमेशा के लिए अस्पृश्य। एक बार ब्राह्मण तो हमेशा के लिए ब्राह्मण। एक बार भंगी तो हमेशा के लिए भंगी। जो लोग उच्च जाति में पैदा होते हैं, वह इस व्यवस्था में हमेशा उच्च रहते हैं, और जो निम्न जाति में पैदा होते हैं, वे हमेशा निम्न रहते हैं। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि यह व्यवस्था कर्म, अर्थात् भाग्य के अटल सिद्धांत पर आधारित है, जो एक बार हमेशा के लिए निश्चित होता है और जिसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। इस व्यवस्था में किसी व्यक्तिगत योग्यता या अयोग्यता का कोई स्थान नहीं है। कोई अस्पृश्य ज्ञान और आचार-विचार में कितना ही श्रेष् क्यों न हो, लेकिन ज्ञान और आचार विचार में वह स्पृश्य से नीचे