4. भारत की बहिष्कृत बस्तियां-अस्पृश्यता की केन्द्र-समाज से बाहर - Page 51

36 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

ही समझा जाएगा, जो ज्ञान या आचार-विचार में कितना ही हीन क्यों न हो। कोई स्पृश्य चाहे कितना ही गरीब क्यों न हो, वह उस अस्पृश्य से ऊंचा है, जो चाहे कितना ही अमीर क्यों न हो।

यही है भारतीय गांवों के भीतरी जीवन की तस्वीर। इस गणतंत्र में लोकतंत्र के लिए कोई स्थान नहीं। इसमें समता के लिए कोई स्थान नहीं। इसमें स्वतंत्रता के लिए कोई स्थान नहीं। इसमें भ्रातत्व के लिए कोई स्थान नहीं। भारतीय गांव गणतंत्र का ठीक उलटा रूप है। अगर यह गणतंत्र है तो यह स्पृश्यों का गणतंत्र है, स्पृश्यों के द्वारा है और उन्हीं के लिए है। यह गणतंत्र अस्पृश्यों पर स्थापित हिंदुओं का एक विशाल साम्राज्य है। यह हिंदुओं का एक प्रकार का उपनिवेशवाद है, जो अस्पृश्यों का शोषण करने के लिए है। अस्पृश्यों के कोई अधिकार नहीं हैं। उन्हें तो सिर्फ मुंह जोहना है, सेवा करनी है और अपने को अर्पित कर देना है। उन्हें यह कार्य सिर्फ करते रहना या मर जाना है। उनके कोई अधिकार नहीं हैं, क्योंकि वे इस तथाकथित गणतंत्र के बाहर हैं। वे हिंदुओं के समाज से बहिष्कृत हैं। यह एक दुश्चक्र है। लेकिन यह एक यथार्थ है, जिसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

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