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मनुष्यों में रहने के अयोग्य
अस्पृश्य, जैसा कि पिछले अध्यायों में बताया गया है, हिंदू समाज से बाहर हैं। लेकिन अभी यह सवाल बाकी है कि उन्हें हिंदुओं से कितनी दूरी पर रखा गया है? अगर हिंदू उन्हें हिंदू के रूप में नहीं मानते, तब वे मानव मानकर उनके साथ किस प्रकार का व्यवहार करते हैं? जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिल जाता, तब तक हम अस्पृश्यों के जीवन के बारे में कोई सही तस्वीर नहीं बना सकते। इसका उत्तर है, बशर्ते कि कोई इसे जानना चाहे। कठिनाई केवल यह है कि उस उत्तर को किस प्रकार पेश किया जाए। इसे पेश करने के दो तरीके हैं। या तो यह कि यह उत्तर बयान के रूप में दिया जाए या यह कि कुछ उदाहरण प्रस्तुत किए जाएं। मैं उदाहरण का तरीका अपनाऊंगा। मैं पाठकों को ढेर सारे उदाहरण देकर यह नहीं चाहूंगा कि उनका मन ऊब जाए। मैं कुछेक उदाहरण दूंगा, जिनसे स्थिति स्वतः स्पष् हो जाएगी। पहला उदाहरण मद्रास राज्य से है।
सन् 1909 में श्री वेंकट सुब्बा रेड्डी और उसके साथियों ने मजिस्ट्रेट द्वारा कुछ लोगों की इस शिकायत पर कि उन्होंने उनको बाधा पहुंचाई, भारतीय दंड-संहिता की धारा 339 के अधीन सजा दिए जाने के विरुद्ध मद्रास हाईकोर्ट में अपील की। इस मुकदमे में वादी और प्रतिवादी, दोनों ही हिंदू थे। मद्रास हाईकोर्ट के निर्णय ख्1, में इस मुकदमे का पूरा ब्यौरा तो मिलता ही है, लेकिन इससे स्पृश्यों की तुलना में अस्पृश्यों की स्थिति बड़े ही सटीक ढंग से स्पष् होती है। यह निर्णय उद्धत करने योग्य है। यह इस प्रकार हैः-
- क्रिमिनल लॉ जर्नल (11) में पृ_ 263 पर उल्लिखित।