38 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
‘‘अपीलकर्ताओं (वेंकट सुब्बा रेड्डी तथा अन्य) को इसलिए सजा दी गई है कि उन्होंने कुछ पेरियाओं ख्1, को एक मंदिर के पास सार्वजनिक मार्ग में इस उद्देश्य से खड़ा किया, जिससे वादी उस मंदिर से एक जुलूस उस सड़क से होकर निकाल न सके। यह पता चला कि वादी ने इस आशंका से जूलूस नहीं निकाला कि अगर वह पेरियाओं के पास से होकर गुजरा तो वह अपवित्र हो जाएगा और यह अभियुक्त ने दुर्भाग्यपूर्वक पेरियाओं को सड़क पर खड़ा किया, जिसका एकमात्र प्रयोजन वादी को वहां जाने से रोकना था, जहां उसे जाने का अधिकार था।
हम यह नहीं समझते कि अभियुक्त ने अनुचित अवरोध करने का कोई अपराध किया, हमारे विचार से यह कार्रवाई कोई ऐसी कार्रवाई नहीं थी, जिसे धारा 339 के अंतर्गत बाधा माना जाए। पेरिया लोग कोई बाधक नहीं थे। दरअसल वादी को उनके पास से जुलूस ले जाने से रोकने की कोई बात नहीं थी और उन्हें यह अधिकार था कि वे जहां रहना चाहते थे, रहें। और यह नहीं कहा गया कि उनकी उपस्थिति का प्रयोजन शारीरिक क्षति पहुंचाने का या किसी ऐसे भय को उत्पन्न करना था कि उनकी उपस्थिति से अपवित्र होने के अतिरिक्त कुछ और भी हो सकता था।
शिकायतकर्ता जहां जाना चाहता था, उसको वहां जाने से रोकने का कारण पेरियाओं की उपस्थिति नहीं थी, बल्कि उसका कारण उसकी खुद की अनिच्छा थी, जिसके कारण वह पेरियाओं के पास नहीं गया। जैसा कि श्री कुप्पुस्वामी अय्यर ने कहा है कि यह उसके द्वारा स्वयं किया गया चुनाव था, जिसके कारण वह मंदिर से बाहर नहीं गया। यह उसने अपनी सहमति से किया कि वह वहीं रहा और दंड-संहिता के अर्थ की सीमा में क्षति पहुंचाने का कोई भय नहीं था, जिसके कारण उनकी सहमति मुक्त सहमति न होती। यदि स्थिति इससे भिन्न होती, तब यह समझा-जाता कि किसी भी पेरिया के खिलाफ गलत खड़े होने के बारे में शिकायतकर्ता द्वारा की गई यह शिकायत उचित थी कि जब उससे उस स्थान से कुछ दूर हट जाने के लिए कहा गया, जहां वह अपने किसी काम से बिना किसी कानून का उल्लंघन किए विद्यमान था, तो उसने वहां से हटने से यह जानते हुए मना कर दिया कि जब तक वह वहां रहेगा, तब तक शिकायतकर्ता अपवित्र हो जाने के डर के कारण उसके पास से नहीं जाएगा।
- मद्रास में पेरिया अस्पृश्य जाति होती है।