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मनुष्यों में रहने के अयोग्य

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यह स्पष् है कि इस मामले में कोई अनुचित बाधा नहीं पहुंचाई गई और

हम समझते हैं कि अभियुक्त ने जो वहां पेरिया लोगों को खड़ा किया, उसमें

कोई अंतर नहीं पड़ता। ख्1,

इसलिए हम सजा को रदद करते हैं और यदि कोई जुर्माना अदा कर दिया

गया है, तो वह लौटा दिया जाए।

यह एक ज्वलंत उदाहरण है। मुकदमे में दो पक्ष थे। वेंकट सुब्बा रेड्डी एक पक्ष का नेता था। दोनों पक्ष सवर्ण हिंदू थे। उनके बीच जुलूस ले जाने के अधि कार के बारे में विवाद था। वेंकट सुब्बा रेड्डी अपने विरोधियों को जलूस निकालने से रोकना चाहता था। इसके लिए उसे कोई अच्छा तरीका मालूम नहीं था। तभी उसके दिमाग में यह तरकीब सूझी कि कारगर तरीका यही हो सकता है कि कुछ अस्पृश्यों को सड़क पर खड़ा कर दिया जाए और उनसे वहां से हटने के लिए कहा जाए। यह चाल काम कर गई और उसके विरोधी अपवित्र हो जाने के भय के कारण अपना जुलूस नहीं निकाल सके। यह बात दूसरी है कि मद्रास हाईकोर्ट ने यह फैसला दिया कि पेरियाओं को सड़क पर खड़ा करना कानून की दृषि् में बाधा नहीं कहलाता। लेकिन सच्चाई तो यही है कि सड़क पर पेरियाओं की उपस्थिति हिंदुओं को दूर रखने के लिए काफी है। इसका अर्थ यह हुआ कि हिंदुओं के मन में अस्पृश्यों के प्रति अटूट घृणा भरी हुई है।

दूसरा उदाहरण भी उतना ही ज्वलंत है। यह काठियावाड़ में स्कूल के एक अस्पृश्य मास्टर से संबंधित है। यह श्री गांधी द्वारा प्रकाशित ‘यंग इंडिया’ नामक पत्र के 12 दिसम्बर, 1929 के अंक में पत्र के रूप में छपा था। इस पत्र में उसने यह बताया है कि उसे अपनी पत्नी का एक हिंदू डाक्टर से इलाज कराने में कौन-कौन सी कठिनाइयां आईं और किस प्रकार उसकी पत्नी और उसका बच्चा दोनों ही इलाज ने किए जाने पर मर गए। पत्र में बताया गया है।

‘‘मेरी पत्नी ने इस महीने की पांच तारीख को एक बच्चे को जन्म दिया।

सात तारीख को वह बीमार पड़ गई और उसे दस्त लग गए। वह कमजोर

होती गई। उसके सीने पर सूजन आ गई। उसे सांस लेने में तकलीफ होने

लगी और उसकी पसलियों में बहुत दर्द होने लगा। मैं डाक्टर को बुलाने

गया, लेकिन उसने कहा कि वह हरिजन के घर नहीं जाएगा। वह बच्चे की

जांच करने के लिए भी तैयार नहीं हुआ। तब मैं नगर सेठ के पास गया

  1. जिस मजिस्ट्रेट ने इस मामले की सुनवाई की उसने पेरियाओं की उपस्थिति को बाधा के रूप में पाया

और इसलिए उसने अभियुक्त को दोषी करार दिया।