40 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
और गरसिया दरबार में गया, और उनसे गुजारिश की कि वे इस मामले में
मेरी मदद करें। नगर सेठ ने बतौर डाक्टर की फीस दो रुपये की जमानत
दी। डाक्टर इस शर्त पर आया कि वह उन्हें हरिजन की बस्ती के बाहर
देखेगा। मैं अपनी पत्नी और उसके हाल के हुए बच्चे को बस्ती के बाहर
ले गया। तब डाक्टर ने अपना थर्मामीटर एक मुसलमान को दिया, उसने
मुझे दिया और मैंने उसे अपनी पत्नी को लगाया और बाद में इसी प्रक्रिया
के द्वारा थर्मामीटर डाक्टर को लौटा दिया गया। तब कोई रात के आठ बजे
होंगे। डाक्टर ने लालटेन की रोशनी में थर्मामीटर देखा और कहा कि मरीज
को निमोनिया हो गया है। इसके बाद डॉक्टर चला गया और उसने दवाई
भेज दी। मैं बाजार से अलसी का तेल खरीद लाया और उसे अपनी पत्नी
के सीने पर मला। इसके बाद डाक्टर दुबारा आने के लिए तैयार न हुआ,
हालांकि मैंने उसे उसकी फीस के दो रुपये दे दिए थे। यह बीमारी खतरनाक
है। भगवान ही हमारा भला करेगा।
मेरे जीवन की ज्योति बुझ गई। आज दोपहर दो बजे मेरी पत्नी का देहांत
हो गया।
इस पत्र में स्कूल के अस्पृश्य मास्टर का नाम नहीं दिया गया। इसी प्रकार डाक्टर का नाम भी नहीं बताया गया है। ऐसा स्कूल के अस्पृश्य मास्टर के अनुरोध पर किया गया, क्योंकि उसे बाद में अपने सताए जाने की आशंका थी। इसमें जो बातें बताई गई हैं, वह सच हैं।
इसकी व्याख्या करने की कोई जरूरत नहीं है। काफी पढ़े-लिखे होने पर भी एक डाक्टर ने ऐसी महिला के थर्मामीटर लगाना और उसका इलाज करना अस्वीकार कर दिया, जिसकी हालत काफी नाजुक थी। चूंकि उसने उसका इजाल करने स मना कर दिया इसलिए वह महिला मर गई। उस डाक्टर को इस बात का तनिक भी ख्याल नहीं हुआ कि वह उस आचरण-संहिता का उल्लंघन कर रहा है, जो उसके व्यवसाय के लिए अनिवार्य होती है। हिंदू एक अस्पृश्य को छूने के बजाय अमानवीय होना अधिक पसंद करता है।
तीसरा उदाहरण 23 अगसत 1932 के ‘प्रकाश’ से लिया गया हैः
‘‘तहसील जफरवाल के गांव जगवाल में 6 अगस्त को एक बछड़ा कुएं
में गिर पड़ा। उस समय राम महाशय नाम का एक डोम ख्1, पास में ही खड़ा
- संयुक्त प्रात और बिहार में डोम अस्पृश्य जाति होती है।