मनुष्यों में रहने के अयोग्य
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हुआ था। वह तुरंत कुएं में कूद पड़ा और उसने बछड़े को अपनी गोद में उठा
लिया। तीन-चार आदमी उसकी सहायता के लिए आ गए और बछड़े को बचा
लिया गया। लेकिन गांव के हिंदुओं ने आसमान सिर पर उठा लिया कि इस
आदमी ने हमारा कुआं ही गंदा कर दिया और बेचारे को डांटने-फटकारने लगे।
सौभाग्य से वहां एक बैरिस्टर आ गया। उसने उन लोगों को खूब डांटा-फटकारा,
जो साधूराम से झगड़ रहे थे और उन्हें शांत किया। इस प्रकार एक आदमी
की जान बच गई, वरना पता नहीं क्या होता।’’
यहां क्या महत्वपूर्ण है-एक अस्पृश्य द्वारा बछड़े की रक्षा करना और उसके कारण कुएं का गंदा हो जाना, हिंदुओं के विचार से बेहतर होता यदि उस बछड़े को मरने दिया जाता और कुएं को गंदा होने से बचाना।
एक ऐसा ही मामला 19 दिसम्बर 1936 के ‘बंबई समाचार’ में छपा हैः
‘‘कालीकट के एक गांव कलाडी में एक युवती का बच्चा कुएं में गिर
पड़ा। वह जोर-जोर चिल्लाने लगी, लेकिन किसी की हिम्मत कुएं में कूदने
की न हुई। वहां से एक अजनबी गुजर रहा था। वह बच्चे की रक्षा के लिए
तुरंत कुएं में कूद पड़ा। जब उससे लोगों ने उसके बारे में पूछा कि वह कौन
है, तो उसने जवाब दिया कि वह अस्पृश्य है। वहां लोगों ने उसके प्रति आभार
प्रकट करने के बजाय उस पर गालियों की बौछार करनी शुरू कर दी और
उसे मारा-पीटा कि उसने कुआं गंदा कर दिया।’’
हिंदुओं के लिए अस्पृश्य कितना गंदा और साथ में रहने के अयोग्य समझा जाता है। यह जुलाई 1937 के लखनऊ से प्रकाशित ‘आदि हिंदू’ नामक पत्र में प्रकाशित इस घटना से प्रकट होता हैः
‘‘मद्रास होल्म्स कंपनी का एक कर्मचारी हाल ही में मर गया, जो अपने
आपको ऊंची जाति का कहता था। जब उसकी चिता को अग्नि दी गई, तो
उसके परिवार वालों और वहां खड़े लोगों ने उसकी चिता पर चावल फेकें।
दुर्भाग्य से उसके दोस्तों में से एक अस्पृश्य भी था, जो मद्रास का आदि-द्रविड़
था। उसने भी दूसरे लोगों की तरह चिता पर चावल फेंके। इस पर सवर्ण हिंदुओं
ने उसे भला-बुरा कहा कि उसने चिता को अपवित्र कर दिया। इस बात पर
काफी गरमा-गरमी हुई और बात यहां तक पहुंच गई कि दो आदमियों के पेट
में चाकू घोंप दिया गया। एक आदमी तो अस्पताल जाते-जाते मर गया और
दूसरे की हालत नाजुक बताई जाती है।’’