42 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
एक घटना है, जो इससे भी बढ़कर है। बंबई में 6 मार्च, 1938 को दादर के पास कासरवाड़ी (वूलेन मिल्स के पीछे) में इंदूलाल याज्ञनिक की अध्यक्षता में भंगियों की एक सभा हुई। इस सभा में एक भंगी युवक ने आपबीती इस प्रकार सुनाईः
‘‘मैंने 1933 में वर्नाक्यूलर परीक्षा पास की। मैंने चौथी कक्षा तक अंग्रेजी
पढ़ी थी। मैंने बंबई नगर पालिका की स्कूल कमेटी को एक अध्यापक के
रूप में नियुक्त के लिए आवेदन-पत्र दिया। परंतु वहां कोई जगह खाली नहीं
थी, इसलिए मुझे सफलता नहीं मिली। फिर मैंने अहमदाबाद के पिछड़ी जाति
अधिकारी को आवेदन-पत्र दिया कि मुझे पटवारी की नौकरी दी जाए, और
मैं सफल हो गया। 19 फरवरी, 1936 को मुझे खेड़ा जिले के वरसाड तालुका
में मामलातदार के यहां पटवारी नियुक्त किया गया।
हालांकि हमारा परिवार गुजरात का है, लेकिन मैं इससे पहले कभी गुजरात
नहीं गया था। गुजरात जाने का मेरा यह पहला मौका था। मुझे यह नहीं
मालूम था कि सरकारी दफतरों में भी छुआछूत होती है। इसके अलावा, मैंने
अपने आवेदन-पत्र में भी यह लिख दिया था कि मैं एक हरिजन हूं, इसलिए
मुझे उम्मीद थी कि मेरे वहां पहुंचने से पहले ही लोगों को यह पता चला
जाएगा कि मैं कौन हूं। जब मैं मामलातदार के दफतर में पहुंचा और पटवारी
का कार्यभार संभालने के लिए उपस्थित हुआ, तो वहां के क्लर्क का रवैया
देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ।
कारकून ने मुंह बिचका कर पूछा, ‘तुम कौन हो?’ मैंने उत्तर दिया,
‘श्रीमान, मैं एक हरिजन हूं।’ उसने कहा, दूर हटो। वहां दूर खड़े होकर बात
करो। मेरे पास आकर खड़े होने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई। गनीमत है कि
यह दफतर है। दफतर के बाहर होता तो मैं तुझे छह ठोकर मारता। यहां नौकरी
पर आने की हिम्मत कैसे हुई। इसके बाद उसने मुझसे कहा कि मैं अपनी
प्रमाण-पत्र और पटवारी के लिए नियुक्ति-पत्र जमीन पर डाल दूं। उसने उन्हें
वहां से उठाया। जब मैं वरसाड में मामलातदार के दफतर में काम करता था,
तो मुझे पानी पीने के लिए बहुत कष् उठाना पड़ता था। दफतर के बरांडे में
पानी के घड़े रखे होते थे। पानी पिलाने वाला एक नौकर भी था। उसका काम
दफतर के क्लर्कों को जब वे आते, पानी पिलाना था। जब पानी पिलाने वाला
नहीं होता था तो वे उन घड़ों से खुद पानी ले लेते थे। मेरे लिए ऐसा करना
असंभव था। मैं घड़ों को छू भी नहीं सकता था, क्योंकि मेरे छू लेने से पानी