5. मनुष्यों में रहने के अयोग्य - Page 58

मनुष्यों में रहने के अयोग्य

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गंदा हो जाता। इसलिए मेरा पानी पीना दूसरों की कृपा पर निर्भर करता था। मेरे लिए वहां एक जंग खाया कनस्तर रख दिया गया था। कोई उसे छूता ही नहीं था और उसे मेरे सिवाय कोई साफ भी नहीं करता था। मेरे लिए इसी कनस्तर में पानी डाल दिया जाता था। लेकिन वह पानी भी मैं तभी पी सकता था, जब पानी पिलाने वाला वहां मौजूद हो। उस आदमी की इच्छा मुझे पानी देने की न होती थी। जब वह यह देखता कि मैं पानी पीने के लिए आ रहा हूं, तो वह जान-बूझकर इधर-उधर हो जाया करता था। नतीजा यह होता था कि मैं प्यासा ही रह जाता था। अक्सर मुझे प्यासा रहना पड़ता था।

मकान के मामले में भी मेरे सामने ऐसी ही मुश्किलें आईं। मैं वरसाड में अजनबी था। कोई सवर्ण हिंदू मुझे रहने के लिए किराए पर मकान क्यों देता? वहां के अस्पृश्य भी मुझे इसलिए मकान देने के लिए तैयार न हुए कि वहां के हिंदू लोग कहीं उनसे नाराज न हो जाएं। हिंदू नहीं चाहते थे कि मैं वहां एक क्लर्क के रूप में कार्य करूं, जो मेरे लिए ऊंची नौकरी थी। इससे भी ज्यादा मुश्किलें खाना खाने के बारे में सामने आईं। मैं कहीं से भोजन प्राप्त नहीं कर सकता था। मैं सुबह-शाम भाजा खरीदकर खाता था, और वह भी मैं गांव के बाहर अकले में खाता। लौटकर फिर मामलातदार के दफतर की सीढि़यों पर सो जाता था। मैंने चार दिन ऐसे ही बिताए। जब मुझसे बर्दाश्त न हुआ, तब मैं जन्तराल में रहने के लिए चला गया, जो मेरा पुश्तैनी गांव था। यह वरसाड से करीब छह मील दूर है। मुझे रोजाना ग्यारह मील आना-जाना पड़ता था। मैंने डेढ़ महीने इसी प्रकार गुजारे।

इसके बाद मामलातदार ने मुझे पटवारीगिरि सीखने के लिए एक पटवारी के पास भेज दिया। उस पटवारी के अधीन तीन गांव, जनतराल, खापुर और सैजपुर थे। वह जंतराल में रहता था। मैं जन्तराल में उसी पटवारी के साथ दो महीने रहा। उसने मुझे इस बीच में कुछ नहीं सिखाया। मैं उसके दफतर के अंदर एक बार भी नहीं जा सका। गांव का मुख्यि खासतौर से मुझसे चिढ़ता था। एक बार उसने मुझसे कहा, तुम लोग, तुम्हारा बाप, तुम्हारा भाई पटवारी के दफतर में झाड़ू लगाते थे और तुम दफतर में हमारे बराबर बैठना चाहते हो? होश में आओ, और यह नौकरी छोड़ दो?’’

एक दिन पटवारी ने मुझे सैजपुर बुलाया और गांव की जनसंख्या की तालिका बनाने को कहा। मैं जन्तराल से सैजपुर गया। मैंने देखा कि मुखिया और पटवारी कोई काम कर रहे थे। मैं गया, दफतर के दरवाजे के पास