5. मनुष्यों में रहने के अयोग्य - Page 59

44 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

खड़ा रहा। मैंने उनको नमस्ते की, पर किसी ने मेरी तरफ देखा तक नहीं। मैं पंद्रह मिनट तक बाहर खड़ा रहा। मैं अपनी जिंदगी से तंग हो चुका था। इस प्रकार उपेक्षित और अपमानित होने पर मुझे भी गुस्सा आ गया। वहां एक कुर्सी पड़ी थी। मैं उस पर बैठ गया। मुझे कुर्सी पर बैठा देखकर मुखिया और पटवारी मुझसे कुछ कहे बिना चुपचाप वहां से चले गए। कुछ ही देर में वहां लोग आने शुरू हो गए और देखते ही देखते मेरे चारों ओर भीड़ जमा हो गई। इस भीड़ का मुखिया गांव की लायब्रेरी का कर्मचारी था। मेरी समझ में नहीं आया कि क्यों कर एक पढ़ा-लिखा आदमी इस भीड़ का अगुआ बना हुआ है। फिर मुझे पता चला कि यह कुर्सी उसी की थी। उसने मुझे गंदी-गंदी गालिया बकनी शुरू कर दीं। फिर उसने रावनिया (गांव के चौकीदार) से कहा कि इस भंगी के कुत्ते को इस कुर्सी पर किसने बैठने दिया। चौकीदार ने मुझे उठा दिया और मुझसे कुर्सी छीन ली। मैं जमीन पर बैठ गया। तब भीड़ दफतर के भीतर घुस आई और मुझे घेर लिया। लोग गुस्से से लाल हो रहे थे। कुछ मुझे गालियां दे रहे थे और कुछ ने धमकी दी कि धारिया (तेजधार का तलवार जैसा हथियार) से मेरी बोटी-बोटी काट दी जएगी। मैंने उनसे माफी मांगी और दया करने को कहा। भीड़ पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं कैसे जान बचाऊं। मेरे दिमाग में आया कि इस बारे में मैं मामलातदार को बताऊं कि किस तरह यह मुसीबत मेरे गले आ पड़ी है, और अगर इस भीड़ द्वारा मेरी हत्या कर दी जाए, तो मेरे शव का क्या किया जाए। मैंने सोचा कि अगर भीड़ को किसी तरह यह पता चल जाए कि मैं सचमुच मामलातदार से शिकायत कर रहा हूं, तो शायद लोग मुझे छोड़ दें। मैंने चौकीदार से कागज लाने को कहा, जो उसने ला दिया। इसके बाद मैंने बड़े-बड़े अक्षरों में यह चिटठी लिखी, जिसे हर कोई पढ़ सकता था।