मनुष्यों में रहने के अयोग्य
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‘सेवा में,
ममलातदार,
वरसाड तालुका।
महोदय,
कृपया कालीदास शिवराम परमार का विनम्र अभिवादन स्वीकार करें। मैं आपको विनम्रता के साथ सूचित करता हूं कि आज मौत साक्षात मेरे सामने आकर खड़ी हो गई है। यदि मैंने माता-पिता का कहना माना होता, तो आज यह नौबत नहीं आती। कृप्या मेरे माता-पिता को मेरी मौत का समाचार दे दें।’
जो कुछ मैंने लिखा था, उसे लायब्रेरियन ने पढ़ लिया। उन्होंने मुझे चिट्ठी को फाड़ डालने के लिए कहा। मैंने वह चिट्ठी फाड़ दी। उन्होंने जी-भर कर मुझे गालियां सुनाईं और कहा, ‘तुम चाहते हो कि हम तुम्हे पटवारीजी कहें, तुम एक भंगी हो, और दफतर में घुसकर कुर्सी पर बैठना चाहते हो।’ मैंने दया की याचना की और वायदा किया कि ऐसा फिर कभी नहीं होगा। मैंने नौकरी छोड़ देने का भी वायदा किया। जब शाम को सात बजे भीड़ वहां से चली गई, तब तक मैं वहां रहा। तब तक पटवारी और मुखिया नहीं आए थे। उसके बाद मैंने पंद्रह दिन की छुट्टी ली और लौटकर अपने माता-पिता के पास बंबई आ गया।’’
अस्पृश्यों के प्रति हिंदुओं के सामाजिक दृष्किण का एक और उदाहरण है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। यह दृष्किण निम्नलिखित उदाहरणों से और अधिक स्पष् किया जा सकता है।
आठ सितंबर 1943 के ‘अलफजल’ सेः
‘‘नासिक से पहली सितम्बर को यह खबर मिली कि गांव के हिंदुओं ने एक अछूत परिवार पर धावा बोल दिया है। एक बुढि़या के हाथ-पांव बांध दिए, उसे लकडि़यों के ढेर पर डाल दिया और उसमें आग लगा दी। यह सब-कुछ इसलिए हुआ कि वे सोचते थे कि गांव में हैजा इसी की वजह से फैला है।’’