6. अस्पृश्यता और अराजकता - Page 69

54 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

‘‘कुछ दिन पहले सभी तहसील के रहियां गांव में नहर विभाग का एक

अधिकारी आया और उसने कुएं से पानी निकालने में कुछ मेघ अस्पृश्यों की

मदद लेनी चाही। पहले तो उन्होंने पानी भरने से इंकार कर दिया, लेकिन अधि

कारी ने उन्हें खूब डांटा-फटकारा और उनसे जबरदस्ती पानी निकलवाया। अगले

दिन हिंदू कुएं पर इकट्ठा हो गए और उन्होंने चौकीदार को भेजकर वहां मेघों

को बुलवाया और उनसे कहा कि वे कुएं पर कैसे चढ़े? एक मेघ ने कहा

कि हम अपनी मर्जी से कुएं पर नहीं चढ़े और हमारी कोई गलती नहीं थी।

इस बात पर हिंदुओं ने उसकी लाठी-डंडों से पिटाई की। यह समाचार लिखे

जाने तक वह बेहोश पड़ा है। हालांकि डाक्टर ने कहा कि चोटें मामूली हैं, तो

भी जान से मारने की कोशिश और गैर-कानूनी जमावंड़े का मामला पुलिस में

दर्ज कर लिया गया। लेकिन पुलिस ने इसकी अनदेखी कर दी है। इससे मेघ

लोगों में असुरक्षा की भावना फैली हुई है। गांव वाले मेघों को डरा-धमका

रहे हैं, यहां तक कि उनके मवेशी भी पानी नहीं पी सकते। सभी तालाब और

कुएं मेघ लोगों के लिए निषिद्ध है।’’

बात यहीं खत्म नहीं होती कि अस्पृश्य लोग हिंदुओं के कुओं से पानी नहीं भर सकते। वे अपने लिए कुआं नहीं बना सकते, चाहे उनके पास इसके लिए पैसा ही क्यों न हो। पक्का कुआं बनाने का मतलब है कि वे अपने को ऊंचा उठाकर हिंदुओं की बराबरी करना चाहते हैं, जो स्थापित व्यवस्था के प्रतिकूल है।

छह जून 1934 के ‘मिलाप’ में निम्नलिखित घटना छपीः

‘‘पंजाब की अछूत उद्धारक समिति के मंत्री लाला रामप्रसाद जी ने

निम्नलिखित सूचना दी है-

‘‘इन गर्मियों में जगह-जगह से लोगों को पीने के लिए पानी की किल्ल्त

की शिकायतें आ रही हैं। दलित जातियों के लोग, जिनके अपने कुएं नहीं हैं,

अपने-अपने घड़े लेकर कुओं के पास बैठ जाते हैं। अगर कोई व्यक्ति दयालु

हुआ तो वह उनके घड़े में पानी डाल देता है, वरना उन्हें पूछने वाला कोई

नहीं। कुछ इलाकों में किसी भी आदमी को इनके लिए पैसा देने पर भी पानी

नहीं दिया जाता और अगर कोई कोशिश करता भी है, तो मारपीट की नौबत

आ जाती है। उनके लिए गांव के कुओं से पानी लेना तो मना है ही, वे अपने

खर्च से कुएं भी नहीं खुदवा सकते।’’

इस तरह की एक घटना 21 अप्रैल, 1924 के ‘तेज’ में छपी थीः

‘‘लगभग डेढ़ महीना पहले ओपड गांव के करीब ढाई सौ चमारों ने