6. अस्पृश्यता और अराजकता - Page 71

56 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

श्री ठक्कर ने 1927 में देखी थीः

‘‘वरसाड तालुका में श्री ठक्कर ने एक कुएं के पास देखा कि वहां एक

भंगिन खड़ी लोगों से पानी मांग रही थी। वह वहां सवेरे से दोपहर तक खड़ी

रही, लेकिन किसी ने भी उसे पानी नहीं दिया। आध्यात्मिकता की सबसे ज्यादा

अनोखी व्याख्या तो उस प्रक्रिया में मिलती है, जिससे भंगियों को पानी दिया

जाता है। यह पानी उनके बरतनों में सीधे नहीं उंडेला जा सकता। जो भी ऐसा

करेगा, अपवित्र हो जाएगा। श्री ठक्कर ने बताया कि एक बार हमारे अध्यापक

चुन्नीभाई ने अपनी बाल्टी से एक भंगी के बरतन में सीधे पानी डालने का

दुस्साहस किया तो उन्हें इस पर कड़ी चेतावनी दी गई कि ‘मास्टर, यहां यह

सब नहीं चलेगा।’ कुएं के पास ढलान पर एक छोटा-सा हौज बना दिया जाता

है, और जिन लोगों में दया आती हे, वे इस हौज में पानी डाल देते हैं। इस

हौज में नीचे की तरफ बांस की टोंटी लगी होती है। भंगिनें उस टोंटी के पास

अपने बरतन रख देती हैं, जिसके भरने में घंटा-डेढ़ घंटा लग जाता है। श्री

ठक्क्र कहते हैं कि यह वह पानी होता है, जो घड़े भरने के बाद बचा रहता

है और जिसे औरतें नियम से या जब उन्हें पास में खड़ी भंगिन पर दया आती

है तब उस हौज में डाल देती हैं।’’

III

अस्पृश्यों को इस स्थापित व्यवस्था के अंतर्गत पढ़ने-लिखने का कोई अधिकार नहीं है और गांव के स्कूल में दाखिला लेने का तो निश्चित ही कोई अधिकार नहीं है। जिन अस्पृश्यों ने स्थापित व्यवस्था को तोड़ने का साहस किया है, उन्हें हिंदुओं ने कड़ी सजा दी है। इस प्रकार की अनेक घटनाओं में से कुछ घटनाएं निम्नलिखित हैंः

लाहौर से छपने वाले 30 जून, 1921 के ‘आर्य गजट’ सेः

‘‘एक महाशय ने ‘यंग इंडिया’ में एक लेख में लिखा है कि सूरत जिले

में सिसोदरी नाम एक गांव है। यहां थोड़ें दिनों में इतनी राष्ट्रीय जागृति आ

गई है कि यह गांव असहयोग आंदोलन के लिए मानो एक आदर्श बन गया

है। लेकिन इसके बावजूद भी यहां हरिजनों के प्रति वैसा ही उपेक्षा भाव है,

जैसा पहले था। लेखक का कहना है कि मैंने इस गांव के राष्ट्रवादी स्कूल

की एक कक्षा में ढेड जाति के एक बच्चे को एक कोने में सबसे अलग दूर

बैठे देखा। उसके चेहरे-मोहरे से लग रहा था कि वह एक अस्पृश्य बालक

है। मैंने विद्यार्थियों से पूछा कि वह इस बालक को अपने साथ क्यों नहीं