6. अस्पृश्यता और अराजकता - Page 72

अस्पृश्यता और अन्याय

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बिठाते? तो उन्होंने जवाब दिया कि हरिजन लोग जब तक दारू पीना और मांस खाना नहीं छोड़ेंगे, तब तक ऐसा नहीं होगा। वह हरिजन बच्चा तुरंत बोल उठा कि, मैंने यह सब छोड़ दिया है, इस पर सवर्ण जाति के बच्चे कुछ नहीं बोले।’’

बारह फरवरी 1923 के ‘प्रताप’ में महाशय संतरामजी ने लिखा हैः

‘‘हाल ही में सरकार ने एक ब्राह्मण अध्यापक की नियुक्ति की और उसे गांव में चमारों के बच्चों के स्कूल में पढ़ाने के लिए भेजा। जब वह वहां पहुंचा तो ब्राह्मण, क्षत्रिय और दूसरी जाति के लोगों ने उसका बायकाट किया और कहा, तुम यहां चमारों को पढ़ाने और उन्हें हमारे बराबर करने के लिए क्यों आए?’’

ग्यारह अप्रैल 1924 के ‘तेज’ में स्वामी श्रद्धानंद ने लिखा हैः

‘‘खत्सयास में एक राष्ट्रवादी स्कूल है। मैं यहां 1921 में नवंबर महीने के आखिरी दिनों में गया था। वहां मैंने पूछा कि इस स्कूल में कितने हरिजन बच्चे पढ़ते हैं। मुझे बताया गया कि सिर्फ तीन और ये भी कक्षा के बाहर बरामदे में बैठते हैं। मैंने अपने भाषण में इसे बुरा कहा और कहा कि राष्ट्रवादी स्कूल में इन बच्चों को कक्षा के भीतर बैठने की इजाजत होनी चाहिए। स्कूल के मैनेजर ने मेरी सलाह के अनुसार काम किया। अगले दिन स्कूल की सभी बेंचें खाली थीं और आज तक उस राष्ट्रवादी स्कूल में ताला पड़ा हुआ है।’’

अठारह अप्रैल 1924 के ‘मिलाप’ सेः

‘‘यह घटना हौशंगाबाद की है। जिला परिषद ने स्कूलों को एक परिपत्र भेजा कि हरिजन बच्चों को स्कूलों में पढ़ाया जाए। हेडमास्टरों ने इन आदेशों का पालन करना शुरू कर दिया। जब एक स्कूल ने कुछ हरिजन बच्चों को अपने यहां दाखिला दिया, तब इस पर आनरेरी मजिस्ट्रेट को बहुत बुरा लगा और उसने उस स्कूल से अपने बच्चों को हटा लिया। बाकी लोगों ने भी ऐसा ही किया। इन सबने मिलकर स्कूल समिति की बैठक बुलवाई, जिसमें प्रस्ताव पास किया गया कि स्कूलों में हरिजन बच्चों का दाखिला जनता की भावनाओं के विरुद्ध है। उन्होंने कहा कि हरिजन बच्चों के साथ बैठने से ब्राह्मण बच्चों को अपने-अपने जनेऊ बदलने पड़ते हैं, इसलिए यह स्कूल समिति हरिजन बच्चों को पढ़ाने का उत्तरदायित्व नहीं ले सकती।’’

तीन अप्रैल, 1932 के ‘प्रताप’ सेः