58 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
‘‘अहमदाबाद, पहली अप्रैल 1932, बड़ौदा राज्य के नवगांव से समाचार
मिला है कि जब से हरिजनों के स्कूल बंद कर दिए गए हैं और हरिजनों के
बच्चों को गांव के सामान्य स्कूलों में दाखिला लेने की अनुमति दे दी गई है,
गांव वालों ने हरिजनों को निरंतर सताना शुरू कर दिया है। बताया गया है
कि हरिजन किसानों के भूसे के ढेर के ढेर जला दिए गए हैं। उनके कुओं
में मिट्टी का तेल डाल दिया गया है और उनके घरों में आग लगाने की
कोशिश की गई है। जब एक हरिजन बच्चा स्कूल जा रहा था तो उसे रास्ते
में मारा-पीटा गया और खुले आम हरिजनों का सामाजिक बहिष्कार किया जा
रहा है।’’
‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के 26 मई, 1939 के अंक सेः
‘‘खबर है कि जिले में कातीपूर गांव में कुछ लोगों ने एक रात्रि पाठशाला
पर हमला कर दिया, जहां किसान और दूसरे लोगों को पढ़ाया जाता था। उन
लोगों ने अध्यापक को पकड़ लिया और उससे स्कूल बंद कर देने के लिए
कहा, क्योंकि अस्पृश्यों के लड़के पढ़-लिख लेने के बाद बराबरी का बर्ताव
करने लगेंगे। जब अध्यापक ने उनकी बात नहीं मानी तो उसकी पिटाई की
गई और बालकों को भगा दिया गया।’’
इस संबंध में मैं आखिरी उदाहरण 1935 की एक घटना का दे रहा हूं, जो बंबई प्रेसिडेंसी में अहमदाबाद जिले में धोलका तालुका में कवीथा गांव में 8 अगस्त, 1935 को हुई थी।
‘‘बंबई सरकार ने जब सरकारी स्कूलों में अस्पृश्यों के बच्चों को दाखिल किए जाने के बावत आदेश जारी कर दिए, तब कवीथा गांव के अस्पृश्यों ने सोचा कि क्यों न इस आदेश का लाभ उठाया जाए। लेकिन उन पर जो कुछ गुजरी, वह निम्नलिखित हैः
‘‘आठ अगस्त 1935 को कवीथा गांव के अस्पृश्य अपने चार बच्चों को
स्कूल में दाखिल कराने के लिए ले गए। इसे देखने के लिए स्कूल के चारों
तरफ बहुत से सवर्ण हिंदू जमा हो गए। दाखिले की कार्यवाही शांतिपूर्वक
संपन्न हो गई और कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। लेकिन अगले ही दिन गांव
के सवर्ण हिंदुओं ने अपने-अपने बच्चों को उस स्कूल से हटा लिया, क्योंकि
वे नहीं जाहते थे कि उनके बच्चे अस्पृश्यों के बच्चों के साथ पढ़ें और उन्हें
छूत लग जाए।
‘‘उसके कुछ दिनों के बाद एक ब्राह्मण ने 13 अगस्त, 1935 को एक