64 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जनेऊ उतार दें और कसम खाएं कि भविष्य में वे इसे कभी भी नहीं पहनेंगे, नहींतो उन्हें जान से मार डाला जाएगा। इस पर अस्पृश्यों ने शांतिपूर्वक कहा- ‘महाराज, आप हमसे क्यों नाराज हैं? आपके खुद के भाई, आर्य समाजियों ने ये जनेऊ हमें पहनने के लिए दिए हैं और कहा है कि हम हमेशा इस जनेऊ की रक्षा करें, क्योंकि यह हिंदू धर्म की सच्ची निशानी है। अगर आपको इससे एतराज है, तो आप इसे हमारे शरीर से उतार सकते हैं। इस पर राजपूत उन पर लाठी लेकर बरस पड़े और काफी देर तक उनको मारते-पीटते रहे। अस्पृश्यों ने इसको बड़ी सहनशक्ति से झेला और जनेऊ उतारने से इंकार कर दिया। इन हिंदुओं को उनके इस प्रकार पिटते रहने पर कुछ भी तरस नहीं आया और तीन या चार राजपूतों ने मिलकर गौरी राम नाम के हरिजन का जनेऊ तोड़ डाला और उसके शरीर पर खुरपी से खोद-खोदकर जनेऊ का निशान बना दिया।’’
बारह अक्तूबर 1929 के ‘मिलाप’ सेः
‘‘बहमनी गांव के राजपूतों ने अस्पृश्यों के खिलाफ बहुत दिनों से एक अभियान छेड़ रखा है। वहां जनेऊ तोड़ने के बारे में अदालत में एक मुकदमा चल रहा है। इसी अदालत में एक और मुकदमा चल रहा है, जो एक अस्पृश्य औरत के बारे में है। कहा जाता है कि यह औरत 7 अक्तूबर, 1929 को जब फसल काटने जा रही थी, तब एक राजपूत ने उसे बुरी तरह से पीटा, जिससे उसका शरीर लहूलुहान हो गया। यह औरत चारपाई पर लिटाकर घर लाई गई थी।’’
VI
अगर किसी हिंदू की उपस्थिति में कोई अस्पृश्य चारपाई पर बैठा रहता है तो उसकी क्या हालत होती है, यह इस घटना से स्पष् है, जो जुलाई 1938 के ‘जीवन’ में छपी थीः
‘‘सीतापुर जिले के मारगांव पुलिस चौकी के तहत गांव पछेरा में नंदराम और मंगली प्रसाद ने अपने कुछ दोस्तों और और रिश्तेदारों को घर पर भोज पर बुलाया हुआ था। जब मेहमान लोग चारपाइयों पर बैठे हुक्का पी रहे थे, तभी उधर से ठाकुर सूरज बक्श सिंह और हरपाल सिंह जमींदार आ निकले। उन्होंने नंदराम और मंगली प्रसाद को बुलाकर उन लोगों के बारे में पूछा जो चारपाई पर बैठे हुक्का पी रहे थे। मंगली प्रसाद ने कहा कि वे लोग उसके