अस्पृश्यता और अन्याय
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दोस्त और रिश्तेदार हैं, और कहा कि क्या केवल ठाकुर ही चारपाई पर बैठ
सकते हैं। इस पर दोनों ठाकुर आपे से बाहर हो गए। दोनों ठाकुरों ने उन दोनों
भाइयों और उनके आदमियों ने मेहमानों को बुरी तरह से मारा-पीटा। इसके
परिणामस्वरूप एक आदमी और एक औरत बेहोश हो गए और बाकी लोगों
को बुरी तरह से चोटें आई हैं।’’
VII
अस्पृश्य हिंदू हैं। उन्हें दूसरों के समान सभी अधिकार प्राप्त हैं। लेकिन उन्हें वे अधिकार प्राप्त नहीं हो सकते, जो हिंदू समाज-व्यवस्था के नियमों के आड़े आते हैं।
उदाहरण के लिए, कोई अस्पृश्य किसी धर्मशाला में नहीं ठहर सकता जहां और सभी ठहर सकते हैं। इस संबंध में फतेहगढ़ के एक अस्पृश्य श्री कन्हैया लाल जाटव के अनुभव का समाचार अगस्त 1938 के ‘जीवन’ में छपा, जो निम्नलिखित हैः
‘‘जब मैं 15 अगस्त, 1938 को रात के दस बजे इलाहाबाद जंक्शन
के पास एक धर्मशाला में ठहरने के लिए गया, तो मुझे ठहरने में कोई
परेशानी नहीं हुई। मैंने बतौर पेशगी एक रुपया दिया, चारपाई ली और उस
पर बिस्तर लगा दिया। लेकिन जब धर्मशाला में रहने वाले लोग मैनेजर के
पास अपना पता लिखाने गए और जब मैंने अपना पता लिखाते समय अपनी
जाति जाटव लिखी, तब मैनेजर आग-बबूला हो गया और उसने कहा कि
यह धर्मशाला नीच जाति के लोगों के ठहरने के लिए नहीं है। उसने मुझे
तुरंत धर्मशाला छोड़कर चले जाने को कहा। मैंने उससे कहा कि धर्मशाला
के नियमों के मुताबिक यह धर्मशला सिर्फ हिंदुओं के ठहरने के लिए है और
किसी अस्पृश्य के ठहरने पर कोई पाबंदी नहीं है। मैंने उससे पूछा, क्या मैं
हिंदू नहीं हूं, जो तुम मुझे बाहर निकाल रहे हो। मैंने यह भी कहा कि मैं
फर्रुखाबाद का रहने वाला हूं और मैं इलाहाबाद में किसी को नहीं जानता
हूं। मैं रात के ग्यारह बजे कहा जाऊं। इस पर मैनेजर आपे से बाहर हो गया
और उसने ‘रामायण’ की यह चौपाई दोहराते हुए (ढोल, गंवार, शूद्र, पशु,
नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी) कहा कि ‘एक नीच जाति का होने के
बावजूद नियम-कानून की बात करने का दुस्साहस करता है। तेरी जब तक
पिटाई न की जाएगी, तू बाहर नहीं जाएगा। तब एकाएक उसने मेरा बिस्तर