6. अस्पृश्यता और अराजकता - Page 81

66 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

और अन्य सामान उठाकर धर्मशाला से बाहर फेंक दिया। वहां खड़े सभी

लोग मुझे पीटने के लिए तैयार हो गए। स्थिति की गंभीरता को समझकर

मैंने तुरंत धर्मशाला छोड़ दी और मैं उसके समाने वाली एक दुकान से लगे

तख्ते पर आकर लेट गया। मुझे उस दुकानदार को रात-भर के लिए किराए

के रूप में दो आने देने पड़े। मैं अपने अनुसूचित जाति के भाइयों से अपील

करता हूं कि वे जगह-जगह मीटिंग करें और सरकार पर इस बात के लिए

जोर डालें कि वह या तो हम लोगों के लिए अलग धर्मशाला बनवाए या

सभी मौजूदा धर्मशालाएं हम लोगों के लिए भी खोल दें।’’

VIII

स्थापित समाज-व्यवस्था में मरे हुए जानवरों को उठाने और सफाई आदि का काम करना हिंदुओं की प्रतिष के विरुद्ध है। यह काम अस्पृश्यों को ही करना चाहिए। अस्पृश्य भी सोचने लगे हैं कि उनके लिए अपमानजनक काम है, इसलिए वे इन कामों के करने से इंकार करने लगे हैं। लेकिन ये काम हिंदुओं द्वारा अस्पृश्यों से उनकी मर्जी के बिना जबरदस्ती कराए जाते हैं। जून 1938 के ‘जीवन’ में यह समाचार छपा हैः

‘‘मई 1938 में एक दिन अलीगढ़ जिला, थाना बर्ला, गांव बिपौली में जब

भज्जू राम जाटव लगभग ग्यारह बजे दिन में अपने घर में था, तब पृथीक,

होडल, सीताराम देवी और चुन्नी नाम के कुछ ब्राह्मण लाठियां लिए हुए उसके

घर आए और उन्होंने भज्जू से मरे हुए मवेशी को उठाने के लिए चलने के

बारे में जोर-जबरदस्ती की और जब उसने यह कहकर इंकार कर दिया कि

मैं यह काम नहीं करता हूं, आप किसी और को ले जाएं जो यह काम करता

है, तब उन ब्राह्मणों ने उसकी निर्दयतापूर्वक लाठियों से मारा-पीटा।’’

इसी पत्रिका के अक्तूबर 1938 के अंक में निम्नलिखित समाचार छपा हैः

‘‘चौबीस अक्तूबर 1938 को मथुरा जिले की सादाबाद तहसील के लोध

ारी गांव में एक ब्राह्मण का कोई मवेशी मर गया। जब गांव के अस्पृश्य लोगों

से मुर्दा जानवर को उठाने के लिए कहा गया, तब उन्होंने इंकार कर दिया।

इससे हिंदू इतने चिढ़ गए कि उन्होंने अनुसूचित जाति के लोगों से कहा कि वे

उनके खेतों में टट्टी-पेशाब के लिए नहीं जा सकते और न ही उनके जानवर

उनके खेतों में चर सकते हैं।’’