अस्पृश्यता और अन्याय
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IX
अस्पृश्य लोग साफ-सुथरे कपड़े नहीं पहन सकते, न ही वे सोने-चांदी के जेवर पहन सकते हैं। अगर अस्पृश्य इस नियम का पालन नहीं करते तब हिंदुओं को उनको सबक सिखाने में कोई संकोच नहीं होगा। अस्पृश्य इस नियम को तोड़ने की कोशिश करते रहते हैं। लेकिन इसका क्या नतीजा होता है, यह निम्नलिखित घटनाओं से स्पष् है, जो समाचार-पत्रों में अक्सर प्रकाशित होती रहती हैंः
‘‘1922 तक बूंदी के बरार जिले के बलाई नामक अस्पृश्य जाति को गेहूं
का आटा खाना मना था। फरवरी 1922 को जयपुर के सकतगढ़ में एक चमार
स्त्री को इसलिए मारा-पीटा गया कि उसने अपने पैरों में चांदी के जेवर पहन
रखे थे। उसे बताया गया कि चांदी के जेवर केवल बड़ी जाति के लोग ही
पहन सकते हैं और वे ही गेहूं का आटा खा सकते हैं। नीच जाति के लोग
इनकी उम्मीद न करें। अब तक हम यही सोचते थे कि ये पुराने रीति-रिवाज
समय के साथ-साथ बीत चुके हैं।’’
साफ-सुथरे कपड़े और सोने के गहने पहनने पर मध्य भारत की अस्पृश्य बलाई जाति के लोगों पर जो अत्याचार किया गया, उसके बारे में ‘टाइम्स’आफ इंडिया’ के 4 जनवरी, 1928 के अंक में निम्नलिखित समाचार प्रकाशित हुआः
‘‘मई 1927 के महीने में इंदौर जिले के कनारिया, बिछौली हप्सी,
बिछौली मरदाना और लगभग पंद्रह अन्य गांवों के सवर्ण हिंदुओं अर्थात्
पाटिलों और पटवारियों सहित कलोतों, राजपूतों और ब्राह्मणों ने अपने-अपने
गांवों में बलाई जाति के लोगों को यह चेतावनी दी कि अगर वे लोग गांव
में उनके साथ रहना चाहते हैं, तो उन्हे निम्नलिखित नियमों का पालन
करना पड़ेगा।
बलाई जाति के लोग जरी की किनारी वाली पगड़ी नहीं पहनेंगे,
वे रंगीन या फैंसी किनारीदार धोती नहीं पहनेंगे,
वे हिंदू की मृत्यु होने पर उसके रिश्तेदारों को खबर करने जाएंगे, चाहे
वे कितने ही दूर क्यों न रहते हों,
- वे हिंदुओं के यहां विवाह के अवसर पर बरात के आगे और विवाह के
दौरान गाने-बजाने का काम करेंगे,
बलाई स्त्रियां फैंसी लहंगा व कुर्ता नहीं पहनेंगी,
बलाई स्त्रियां हिंदू घरों में दाई वगरैह का काम करेंगी,