68 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
- बलाइयों को ये खिदमतगारी बिना उजरत करनी होगी और हिंदू खुशी से
जो दें, उसे उन्हें स्वीकार करना पड़ेगा, और
- अगर बलाई इन शर्तों को नहीं मानते हैं तो वे गांव छोड़ दें।
जब बलाइयों ने इन शर्तों को मानने से इंकार कर दिया, तब हिंदुओं ने उनके विरुद्ध कार्रवाई शुरू कर दी। बलाइयों का कुओं से पानी लेना बंद कर दिया गया। वे अपने जानवरों को चरा नहीं सकते थे। बलाइयों का हिंदुओं की जमीन पर से होकर गुजराना बंद कर दिया गया। अगर किसी बलाई के खेत के चारों ओर हिंदुओं के खेत थे, तो उसका अपने खेत तक जाना रोक दिया गया। हिंदुओं ने अपने जानवर बलाइयों के खेत में चरने के लिए छोड़ दिए।
बलाइयों ने इंदौर दरबार में इन अत्याचरों के खिलाफ गुहार की, परंतु उन्हें समय पर मदद नहीं मिली और अत्याचर बढ़ता गया। सैकड़ों बलाइयों को अपने बाल-बच्चों सहित अपने-अपने गांव छोड़ने पड़े, जहां उनके पुरखे पीढि़यों से रहते थे और उन्हें पड़ोस की धार, देवास, बागली, भोपाल, ग्वालियर नाम रियासतों के गांव में रहने के लिए जाना पड़ा।
हाल में रेवती गांव के हिंदुओं द्वारा जो इंदौर शहर के उत्तर में सिर्फ आठ मील दूर है, बलाइयों के बारे में अन्य हिंदुओं द्वारा बनाए गए नियमों के आध ार पर स्टाम्स लगे शर्तनामा पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा गया, जिसे करने से बलाइयों ने इंकार कर दिया। कहा जाता है कि उनमें से कुछ बलाइयों की हिंदुओं ने पिटाई की, एक बलाई को खंबे से बांध दिया गया और उससे कहा गया कि उसे तभी छोड़ा जाएगा जब वह समझौते पर हस्ताक्षर के लिए राजी हो जाएगा।
एक अन्य घटना 21 जनवरी, 1928 के ‘आर्य गजट’ में छपी हैः
‘‘अब तक लोग यही समझते थे कि हरिजनों पर अत्याचार की घटनाएं अधिकतर मद्रास में होती हैं, लेकिन अब शिमला के महाराणा का व्यवहार सुनकर लोगों का भ्रम दूर हो गया है। अब इन घटनाओं के लिए इतनी दूर जाने की जरूरत नहीं। शिमला जिले में एक जाति है ‘कोली’ जिसके लोग काफी सुंदर और मेहनती होते हैं। उस इलाके के हिंदू इन्हें अस्पृश्य मानते हैं, हालांकि वे ऐसा कोई काम नहीं करते, जिसके कारण उन्हें हिंदू धर्म में अस्पृश्य कहा जाए। इस जाति के लोग न केवल बलिष् और सुडौल होते हैं,