अस्पृश्यता और अन्याय
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के प्रति आभार प्रकट करती है, जिन्होंने सर्वश्री सी. एस. गोपालन, एम. एस. संकरनारायणन और पी. सी रामकृष्ण वाडियार के प्रबुद्ध नेतृत्व में हरिजनों की सहायता करने का अपूर्व प्रयास किया। लेकिन साथ ही स्थानीय अधिकारियों, विशेष रूप से पुलिस विभाग के प्रति उनकी घोर लापरवाही के लिए गंभीर अंसतोष भी व्यक्त करती है, जिसके कारण इन उत्पीडि़त हरिजनों को उनसे समय पर कोई भी सुरक्षा नहीं मिली।
यह कांफ्रेंस यह भी सूचित करती है कि उक्त दमन के लगभग हर मामले में पीडि़त हरिजनों को पुलिस से न तो कोई सुरक्षा ही मिली है और न उससे कोई न्याय ही मिला। ऐसे कई उदाहरण हैं, जिनमें इन बेचारे हरिजनों को इन मामलों की गवाही देने के लिए आगे आने पर पुलिस द्वारा मारा-पीटा तक गया। इन घटनाओं के कारण मलाबार के हरिजनों की काफी दुर्दशा है और अगर इन घटनाओं को ऐसे ही होने दिया गया, तब यह बहुत बड़ा संकट हो जाएगा, जिससे उन सभी प्रगतिशील हरिजनों की जान-माल को खतरा उत्पन्न हो सकता है, जो मलाबार में जात-पांत और स्वार्थी लोगों द्वारा आर्थिक शोषण की बेडि़यों को तोड़ने में लगे हुए हैं। यह कांफ्रेंस भारत सरकार, आनरेबुल, डॉ. भीमराव अम्बेडकर और देश के अन्य प्रबुद्ध व्यक्तियों से यह हार्दिक अनुरोध करती है कि वे कृपया यह सुनिश्चित करें कि इस देश में हरिजनों को लोकतंत्रात्क देश के स्वतंत्र नागरिक की भांति रहने दिया जाए, वे किसी के भी द्वारा सताए न जाएं और जब कभी औरों के द्वारा उनका दमन हो, तब प्रशासनिक तंत्र द्वारा उनको तुरंत सुरक्षा प्रदान की जाए।’’
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साधन संपन्न होने पर भी अस्पृश्य को स्वादिष् भोजन नहीं करना चाहिए। अगर वह अपने जीवन में इस स्थिति से ऊपर उठना चाहता है, तब वह अपराध करता है। ‘प्रताप’ के 26ंफरवरी, 1928 के अंक में निम्नलिखित घटना छपी हैः
‘‘जोधपुर रियासत में एक जगह है, चंदयाल। यहां आपको अभी भी ऐसे लोग मिलेंगे, जो यह सोचते हैं कि हरिजनों को हलवा खाने तक का अधि कार नहीं है। यहां अनुसूचित जातियों में एक जाति है, सरगारो। कुछ दिनों पहले वहां दो-तीन लड़कियों की शादी के मौके पर बरातियों के लिए हलवा बनवाया गया था। इस काम के लिए ठाकुर साहब के यहां से मैदा लाया गया।