6. अस्पृश्यता और अराजकता - Page 87

72 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

खाना-खाने के वक्त पर बराती खाना खाने आए, तभी चंदयाला के कुंवर साहब

ने सरगारो के लिए यह हुकुम कहलवा भेजा कि वे हलवा नहीं खा सकते

हैं। इस पर कुछ दरबारी चापलूसों ने बातचीत कर यह तय किया कि कुंवर

साहब को दो सौ रुपये नजर किए जाएं और तब हलवा खाने की इजाजत दे

दी जाएगी। इस पर सरगारो लोग भड़क उठे और उन्होंने रुपया नजर करने से

इंकार कर दिया।’’

XI

हर सवर्ण हिंदू को गांव की प्रधान गलियों से बरात ले जाने का अधिकार है। इस बात का भी प्रमाण है कि जिस जाति को यह अधिकार मिला हुआ है, वह जाति आदर का पात्र समझी जाती है। अस्पृश्यों को इस प्रकार का कोई अधिकार नहीं है। लेकिन वे अपनी बरातें गांव की प्रधान गलियों से निकालते हैं, और ऐसा कर वे इस अधिकार को प्राप्त करने के लिए अपना हक जताते रहते हैं, जिसका उद्देश्य समाज में अपनी सत्ता स्थापित करना होता है। उनके इस हक के बारे में हिंदुओं की प्रतिक्रिया क्या होती है, यह निम्नलिखित घटना से स्पष् है।

जुलाई 1927 के ‘आदि हिंदू’ सेः

‘‘बंगलौर 27 मई, 1927, प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट ने सात ब्राह्मणों पर

सौ-सौ रुपये का जुर्माना किया। इन लोगों ने सर्वविदित पेरिया अस्पृश्य जाति

के एक जुलूस पर, जब वह माजकोट रोड से गुजर रहा था, जहां केवल

ब्राह्मण रहते हैं, मनमाने से हमला किया।’’

पच्चीस अक्तूबर 1931 के ‘प्रताप’ सेः

‘‘गढ़वाल जिले के हरगांव नामक एक गांव में ऊंची जाति के हिंदुओं ने

जब यह सुना कि अस्पृश्यों की एक बरात आ रही है और दूल्हा पालकी में

आ रहा है तो वे बड़ी संख्या में इकट्ठा हो गए और उन्होंने बरात को घेर

लिया तथा लोगों की जमकर पिटाई की। उन्होंने कड़कड़ाती ठंड में बरात को

24 घंटे तक भूखा रोके रखा। बरातियों के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया

और पुलिस के आने पर ही उन्हें इस कठिन परिस्थिति से मुक्ति दिलाई जा

सकी।’’

लाहौल के 3 नवंबर, 1931 के ‘सत्य संवाद’ सेः